विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५० विनय-पत्रिका वेशकी सुन्दर टट्टी बनाकर उसे कपट-समूहरूपी हरे पल्लवोंसे छाता हूँ। फिर (राम) नामकी लग्गी लगाकर ललित वचनोंका लासा लगाता हूँ और बहेलियोंकी तरह विषयरूपी पक्षियोंको फँसाता हूँ ॥२॥ मेरे एक-एक रोमपर सौ करोड़ कुटिल वारे (निछावर किये) जा सकते हैं, फिर भी मैं अपनेको प्रथम श्रेणीके सन्तोंमें गिनाता हूँ। मैं परम नीच एवं क्षुद्र हूँ, तथा अभिमानके पहाड़पर चढ़ा हुआ हूँ (अर्थात् बहुत बड़ा अभिमानी हूँ)। मूर्ख होनेपर भी अपनेको सर्वज्ञ और भक्त-मणि सूचित करता हूँ ॥३॥ हे रामजी ! नहीं कह सकता कि सच है या झूठ, पर कोई-कोई मुझे आपहीका (दास) कहते हैं और मैं भी अपनेको आप- हीका कहलवाता हूँ। अतः हे देव ! अब आप अपने बानेकी लाज करके इस सेवक तुलसीको अपना लीजिये; बाँव (तरह) न दीजिये ॥४॥ विशेष १—'निरचि······बिहँगनि बझावौं'—बहेलिया पक्षियोंको फँसानेके लिए बाँसकी टट्टी बनाकर हरे पत्तोंसे छाता है; यहाँ हरिभक्तिका वेष, यानी तिलक- मुद्रा आदि ही टट्टी है और कपट अर्थात् ऊपर तो वैराग्यके चिह्न और अन्त- करणमें विषय-कामना, यही हरे पत्ते हैं। यहाँ संसारको सुनानेके लिए राम- नामका जप ही लग्गी है और ललित वचन ही लासा है। [२०९] नाहिनै नाथ ! अवलंब मोहिं आन की ! करम-मन-वचन पन सत्य करुनानिधे, एक गति राम ! भवदीय पदत्रान की ॥१॥ कोह-मद-मोह-ममतायतन जानि मन, बात नहिं जात कहि ग्यान-बिग्यान की । काम-संकलप उर निरखि बहु बासनहिं, आस नहिं एक हू आँख निरबान की ॥२॥ बेद-बोधित करम धरम बिनु अगम अति, जदपि जिय लालसा अमरपुर जान की।