विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३४९ करना तो दूर रहा, दुःखमें भी, यदि रामनामका स्मरण किया जाता है तो भगवान् उसे तार देते हैं, यह नहीं सोचते कि हर तरहसे हारकर इसने स्मरण किया है, इसलिए इसकी ओर ध्यान नहीं देना चाहिये । राग कल्याण [२०८] नाथ सों कौन बिनती कहि सुनावौं । त्रिविध¹ विधि अमित अवलोकि अघ आपने, सरन सनमुख होत सकुचि सिर नावौं ॥१॥ विरचि हरिभगतिको बेष बर टाटिका, कपट-दल हरित पल्लवनि छावौं । नाम-लगि लाइ लासा ललित-वचन कहि, व्याध ज्यों विषय-विहँगनि वझावौं ॥२॥ कुटिल सतकोटि मेरे रोम पर वारियहि, साधु गनतीमें पहलेहि गनावौं । परम बर्बर खर्व गर्ब-पर्वत चढ़्यो, अज्ञ सर्वग्य, जन-मनि जनावौं ॥३॥ साँच किधौं झूठ मोको कहत कोड- कोउ राम ! रावरो, हौं तुम्हरो कहावौं । बिरदकी लाज करि दास तुलसिहिं देव ! लेहु अपनाइ अब देहु जनि बावौं ॥४॥ शब्दार्थ—विरचि = रचकर, बनाकर । टाटिका = टट्टी । पल्लवनि = पत्तों । लासा = गोंद । बर्बर = नीच । खर्व = क्षुद्र । जन-मनि = भक्तशिरोमणि । भावार्थ—हे नाथ ! आपको मैं किस तरह अपनी विनती कह सुनाऊँ ! अपने तीनों तरहके (कायिक, वाचिक और मानसिक) अगणित पापोंको देखकर आपके सम्मुख शरणमें होते ही लज्जावश सिर झुका लेता हूँ ॥१॥ ईश्वर-भक्तिके १. पाठान्तर—'विविध' ।