भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 359

३४८ विनय-पत्रिका [ २०७ ] भजिबे लायक, सुखदायक रघुनायक सरिस सरनप्रद दूजो नाहिन। आनंदभवन, दुखदवन, सोकसमन रमारमन गुन गनत सिराहिं न ॥१॥ आरत, अधम, कुजाति, कुटिल, खल, पतित, सभीत, कहूँ जे समाहिं न। सुमिरत नाम बिबसहूँ बारक पावत सो पद, जहाँ सुर जाहिं न ॥२॥ जाके पद कमल लुब्ध मुनि-मधुकर, बिरत जे परम सुगतिहु लुभाहिं न। तुलसिदास सठ तेहि न भजसि कस, कारुनीक जो अनाथहिं दाहिन ॥३॥ शब्दार्थ—समाहिं = समाना, अँटना, आश्रय पाना। मधुकर = भ्रमर। दाहिन = दाहिने, अनुकूल। भावार्थ—श्रीरामजीके समान भजन करने योग्य, सुखदायी और शरण देनेवाला दूसरा कोई नहीं है। आनन्द-स्वरूप, दुःखोंके नाशक, शोकको दूर करनेवाले लक्ष्मीकान्तके गुण गिननेसे समाप्त नहीं हो सकते ॥१॥ जो दुखिया, अधम, कुजाति, कुटिल, दुष्ट, पतित और भयभीत कहीं भी आश्रय नहीं पाते, वे यदि विवश होकर भी एक बार भगवान्‌के नामका स्मरण करते हैं, तो वह पद पा जाते हैं जहाँ देवता भी नहीं जा सकते ॥२॥ जिनके चरणकमलोंमें वे विरक्त मुनि-रूपी भ्रमर लुब्ध रहते हैं जो मोक्षपर भी लुब्ध नहीं होते, तुलसीदास कहते हैं कि रे शठ ! भला तू अनाथोंके अनुकूल रहनेवाले, परम कारुणिक ऐसे प्रभुका भजन क्यों नहीं करता ? विशेष १—'बिबस हूँ'—यहाँपर यह शब्द बड़ा ही सार्थक प्रयुक्त हुआ है। इस शब्दका यह आशय है कि श्रद्धाभक्तिपूर्वक सुखमय समयमें नामका स्मरण