भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 377

कृपासिंधु सुजान रघुबर प्रनत-आरति हरन। दरस-आस-पियास तुलसीदास चाहत मरन ॥५॥ शब्दार्थ—तरुनतर = अत्यन्त युवक, ताजा खिला हुआ। ललित = दुलार किये गये। बटु = ब्रह्मचारी। बधिक = वाल्मीकि। भावार्थ—हे हरे! आप मुझे अपने उन चरणोंका दर्शन कब करायेंगे जो कलियुगके सब पापों और क्लेशोंका नाश करनेवाले तथा सब प्रकारसे कल्याणकारी हैं? ॥१॥ जो चरण शरद ऋतुमें उत्पन्न, सुन्दर और ताजा खिले हुए लाल कमलके रंगके हैं, जिनका लक्ष्मीजी अपनी ललित और अनुपम शोभा धारण करनेवाली हथेलियोंसे दुलार किया करती हैं ॥२॥ जो गंगाजीको उत्पन्न करनेवाले हैं, काम-रिपु शंकरजीके प्रिय हैं, तथा ब्रह्मचारीके कपट वेषमें राजा बलिको छलनेवाले हैं। जिन्होंने ब्राह्मण-पत्नी (अहिल्या), राजा नृग और बधिक-(वाल्मीकि) के दारुणदुःखों और दोषोंको दूर कर दिये ॥३॥ जो सिद्ध, देवता, मुनीन्द्र द्वारा वन्दित हैं तथा सबको सुख और शरण देनेवाले हैं; जिनका एक बार हृदयमें ध्यान करते ही मनुष्य स्वयं तरकर दूसरोंको तारनेवाला बन जाता है ॥४॥ हे रघुनाथजी! आप कृपाके समुद्र हैं और चतुर हैं। आप शरणागतोंका दुःख दूर करनेवाले हैं। यह तुलसीदास (आपके उन चरणोंके) दर्शनकी आशा-रूपी प्याससे मरना चाहता है! (यदि शीघ्रातिशीघ्र आपके चरणोंका दर्शन न मिलो, तो वह अवश्य मर जायगा) ॥५॥ विशेष १—'बिप्रतिय'—अहिल्या; ४३ पदके विशेषमें देखिये। २—'नृग'—२१३ पदके विशेषमें देखिये। ३—'बधिक'—इसका अर्थ वियोगी हरिजीने 'निषाद' लिखा है। किन्तु यहाँ एक तो यह अर्थ ठीक नहीं जँचता, दूसरे इसका सीधा-सादा अर्थ भी यह नहीं है। यों तो भक्तोंमें कुछ भी भेद नहीं है तथापि राजा नृग और अहिल्याकी श्रेणीमें बाल्मीकिका आना तथा शबरी, अजामिल एवं गणिकाकी श्रेणीमें निषादका आना अधिक उत्तम जँचता है। इसलिए यहाँ बधिकका अर्थ 'निषाद' नहीं बल्कि बाल्मीकि करना ही ठीक प्रतीत होता है।