भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 356

विनय-पत्रिका ३४५ स्रवन कथा, मुख नाम, हृदय हरि, सिर प्रनाम, सेवा कर अनुसरु । नयननि निरखि कृपा-समुद्र हरि अग-जग-रूप भूप सीतावरु ॥३॥ इहै भगति, बैराग्य, ज्ञान यह, हरि-तोषन यह सुख व्रत आचरु । तुलसिदास सिव-मत मारग यहि चलत सदा सपनेहुँ नाहिंन डरु॥४॥ शब्दार्थ—निसेष = निःशेष, तनिक भी शेष न रहे । अनुसरु = अनुसरण करु । अग = गमनरहित, जड़ । तोषन = प्रसन्न करनेवाला । आचरु = आचरण कर । भावार्थ—रे मन ! जो तू हरिरूपी कल्पवृक्षको भजना चाहता है, तो अभी विषयोंके विकारको छोड़कर साररूप श्रीरामजीको भज और जो मैं कहता हूँ , वही कर ॥१॥ समता, सन्तोष, अत्यन्त निर्मल विचार और सत्संग, इन चारों- को दृढ़ताके साथ धारण कर; काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं राग-द्वेषको बिलकुल ही छोड़ दे ॥२॥ कानोंसे भगवत्कथा सुन, मुखसे रामका नाम ले, हृदयमें भगवान् (के स्वरूप) का ध्यान कर, मस्तकसे उन्हें प्रणाम कर तथा हाथोंसे सेवाका अनुसरण कर । नेत्रोंसे जड़-चैतन्यमय जानकीवल्लभ भगवान् रामचन्द्रको देख ॥३॥ यही भक्ति है, यही वैराग्य है, यही ज्ञान है और यही परमात्माको प्रसन्न करनेवाला शुभ व्रत है । इसीका तू आचरण कर । तुलसीदास कहते हैं कि भगवान् शिवजीका मत है कि इस मार्गपर चलनेसे स्वप्नमें भी डर नहीं रहता ॥४॥ विशेष १—‘नयननि···सीताबरु’—यहाँ गुसाईंजीने नेत्रोंसे भगवान्‌को देखनेके लिए कहकर परमात्माका रूप भी स्पष्ट रीतिसे बता दिया है कि ‘अग-जग- रूप भूप सीताबरु’। खूब ! २—‘ज्ञान यह’—गुसाईंजी ऊपर बहुत-सी बातें बतलाते हुए कहते हैं कि ‘अग-जग-रूप भूप सीताबरु’ यह समझना ही ज्ञान है । २०४ थे पदकी टीकामें गीताके जिस श्लोकका अवतरण दिया गया है, उससे यहाँ सादृश्य हो जाता है । [२०६] नाहिन और कोउ सरन लायक, दूजो श्रीरघुपति-सम बिपति-निवारन ।