भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 355

३४४ विनय-पत्रिका सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धिसात्त्विकम् ॥ गीता० अ० १८, श्लोक २० अर्थात् 'जिस ज्ञानसे यह मालूम होता है कि विभक्त अर्थात् भिन्न-भिन्न सब प्राणियोंमें एक ही अविभक्त और अव्यय भाव अथवा तत्त्व है, उसे सात्त्विक ज्ञान जानो ।'—आगेके २०५ वें पदमें गोस्वामीजीने भी यही बात कही है। २—'द्वन्द्व-रहित......एकरस'—गोस्वामीजीने इस पदकी दूसरी पंक्तिमें जो देहादि पाँच वस्तुएँ गिनायी हैं, उनकी संगति उन्होंने तीसरी पंक्तिमें द्वन्द्व- रहित आदि पाँच वस्तुओंसे मिलायी है। उसी क्रमसे पाँचवीं पंक्तिमें भी सर्व- भूतहित आदि कहे गये हैं। अर्थात् द्वन्द्व-रहित होते ही सर्वभूत हितता आ जाती है, गतमान होते ही चित्त निर्विकार हो जाता है, ज्ञान-रत (यहाँ साधारण ज्ञानसे आशय है, क्योंकि विशिष्ट ज्ञान तो भक्तिकी चरमावस्था है और यों तो 'ज्ञानहिं भगतिहिं नहिं कछु भेदा' होते ही भक्ति-प्रेमका उद्रेक दिखाई पड़ता है, विषयविरत होते ही दृढ़ नेम हो जाता है और नाना कसोंमें खटाते ही एकरसता प्राप्त हो जाती है। ३—'खटाइ नाना कस'—इसका अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है:— (१) मन इस प्रकार विषयोंसे अलग हो जाता है, जैसे वह कस (काँसा-ताँबा-पीतल आदि) के पात्रोंमें रखी हुई खटाईसे हट जाता है। (२) अनेक प्रकारसे कसनेपर खरा उतरे। (३) अनेकों परीक्षाओंमें पूर्ण उतरे। [२०५] जौ मन भज्यो चहै हरि-सुरतरु । तौ तजि बिषय-बिकार, सार भजु, अजहूँ जो मैं कहौं सोइ करु ॥१॥ सम, संतोष, बिचार बिमल अति, सतसंगति, ये चारि दृढ़ करि धरु । काम-क्रोध अरु लोभ मोह-मद, राग-द्वेष निसेष करि परिहरु ॥२॥

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