विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३४३ ब्राह्मणका अन्य ब्राह्मणसे । अन्य जातिवालोंसे जो सम्बन्ध है, जैसे ब्राह्मणका शूद्रसे—उसे विजातीय सम्बन्ध कहते हैं। अपने अवयवों-(अंगों) से जो सम्बन्ध है, जैसे (हाथ, पैर, मस्तक आदिका सम्बन्ध) उसे स्वगत सम्बन्ध कहते हैं । गुसाईंजीने इन्हीं भेदोंको त्यागनेके लिए कहा है । राग कान्हरा २०४ ] जो मन लागै रामचरन अस । देह-गेह-सुत-वित-कलत्र महँ मगन होत बिनु जतन किये जस ॥१॥ द्वन्द्व-रहित, गतमान, ग्यानरत, बिषय-विरत खटाइ नाना कस । सुख-निधान सुजान कोसलपति है प्रसन्न, कहु क्यों न होहिं बस ॥२॥ सर्व-भूत-हित, निर्व्यलीक चित, भगति-प्रेम दृढ़ नेम एक-रस । तुलसिदास यह होइ तबहिं जब द्रवैं ईस, जेहि हतो सीसदस ॥३॥ शब्दार्थ—वित = धन । कलत्र = स्त्री । कस = धातु (काँसा, पीतल, ताँबा आदि), कसौटी । निर्व्यलीक = निर्मल, निर्विकार । भावार्थ—यदि यह मन रामजीके चरणोंमें इस भाँति लग जाय, जैसे वह शरीर, घर, पुत्र, धन, स्त्रीमें बिना किसी प्रकारका यत्न किये ही मग्न हो जाता है ॥१॥ तो वह अनेक कसोंसे खटाकर या अनेक प्रकारके यत्नोंते निर्मल होकर, या (देहादिकी ओरसे) मुड़कर, द्वन्द्व (शीत-उष्ण, सुख-दुःखादि) रहित, मान- रहित, ज्ञानरत, विषयोंसे विरत (निवृत्त) हो जाय । ऐसी दशामें भला कहो तो सही कि आनन्द-घन, ज्ञाननिधान कोशलनाथ रामजी प्रसन्न होकर क्यों नहीं वशमें हो जायँगे ? ॥२॥ सब प्राणियोंकी भलाईका भाव, निर्विकार चित्त, भक्ति- प्रेम, दृढ़ नेम और एक-रस, यह सब तभी होता है, जब रावण-हन्ता भगवान् रामजी कृपा करते हैं ॥३॥ विशेष १—'ग्यानरत'—ज्ञान क्या है, इसपर और अधिक न लिखकर गीताका एक श्लोक लिख देना अधिक उत्तम होगा । भगवान्ने अर्जुनसे कहा है:—