भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 475 में से

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पृष्ठ 15

४ विनय-पत्रिका विशेष १—एक बार देवताओं और असुरोंने सुमेरु गिरिकी मथानी और शेषनाग- का दण्ड बनाकर समुद्रका मन्थन किया। मन्थन करनेपर सबसे पहले हलाहल विष निकला। उसकी असह्य ज्वालासे दशों दिशाएँ व्याप्त हो गयीं। देवता और दैत्य त्राहि-त्राहि करने लगे। और कोई उपाय न देखकर सबने भक्तवत्सल भगवान् शंकरकी शरण ली। शिवजी प्रकट हुए और देवों-दैत्योंके कल्याणार्थ उसे पान कर गये। परन्तु शीघ्र ही उन्हें स्मरण हुआ कि उनके हृदयमें ईश्वर अपनी अखिल सृष्टिके साथ विराजमान हैं। अतः उन्होंने उस विषको कण्ठमें ही रोक लिया—नीचे नहीं उतरने दिया। इससे उनका कण्ठ नीला हो गया। तभीसे वह 'नीलकण्ठ' कहलाने लगे। २—त्रिपुरासुरके घोर अत्याचारसे तीनों लोकोंको पीड़ित देखकर शिवजीने एक ही बाणमें उसे मार गिराया था। तभीसे उनका नाम 'त्रिपुरारि' पड़ा। ३—काशीखण्डमें लिखा है 'काश्यां मरणान्मुक्तिः' अर्थात् काशीमें मरनेसे मुक्ति होती है। कहते हैं कि यहाँ मृत्युके समय भगवान् शंकर रामतारक मन्त्रका उपदेश देते हैं, इसलिए उस मनुष्यका अज्ञानान्धकार तत्क्षण दूर हो जाता है और वह ज्ञानोदय होनेके कारण मुक्त हो जाता है। राग धनाश्री ( ४ ) दानी कहुँ संकर-सम नाहीं। दीनदयालु दिबोई भावै, जाचक सदा सोहाहीं ॥१॥ मारिकै मार थप्यो जगमें, जाकी प्रथम रेख भट माहीं। ता ठाकुर को रीझि निवाजिबौ, कह्यो क्यों परत मो पाहीं॥२॥ जोग कोटि करि जो गति हरिसों, मुनि माँगत सकुचाहीं। वेद-विदित तेहि पद पुरारि-पुर, कीट पतंग समाहीं ॥३॥ ईस उदार उमापति परिहरि, अनत जे जाचन जाहीं। तुलसिदास ते मूढ़ माँगने, कबहुँ न पेट अघाहीं ॥४॥

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