भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 10

( ७ ) जानकीनाथ, रघुनाथ, रागादि-तम-तरनि तारुन्यतनु तेजधामं । [पद ५१] भावार्थमें आपने लिखा है, “श्रीजानकी-बल्लभ रघुनाथजी रागद्वेषादिरूपी अन्धकारके नाश करनेके लिए सूर्यरूप, तरुण शरीरवाले तेजके स्थान···।” किन्तु इस बातपर आपने ध्यान नहीं दिया कि श्रीरामजी सदा किशोरावस्थामें रहते हैं, तरुणावस्थामें नहीं। देखिये न गोस्वामीजीने इस ग्रंथके ६२वें पदमें कहा है, 'बिसद, किसोर, पीन, सुन्दर बपु, स्याम सुरुचि अधिकाई।' जो 'तारुन्यतनु' वास्तवमें 'तरनि' शब्दका विशेषण है, उस 'तारुन्यतनु' की कैसी छीछालेदर की गयी है। कहाँतक कहें, शब्दार्थ और भावार्थकी भूलोंसे तो पुस्तक भरी ही है, कहीं- कहीं अप्रासंगिक टिप्पणियाँ लिखकर व्यर्थ ही पुस्तकका कलेवर बढ़ाया गया है। उदाहरणार्थ १०८ पदकी पहली टिप्पणी देखिये। उस स्थलपर गोस्वामीजीकी गुरु-भक्ति दिखानेकी अपेक्षा गुरु-महिमा या गुरु शब्दकी परिभाषा बतलाना अधिक संगत होता। इस टीकामें उनकी अधिकांश त्रुटियोंपर टिप्पणी दे दी गयी है, अतः यहाँ उनका विस्तृत उल्लेख करना अनावश्यक है। और बातोंको छोड़िये, आपने स्थल-स्थलपर छन्दोभंग दोष दिखलानेका भी दुःसाहस किया है। कई जगह आपको छन्दोभंग दोष दिखाई पड़ा है। समझमें नहीं आता कि गीति-काव्यमें छन्दोभंग दोष देखना कहाँतक ठीक है। यहाँपर इस बातकी चर्चा करना अप्रासंगिक न होगा कि गीति-काव्य कहते किसे हैं। हमारी तुच्छ बुद्धिमें तो यह आता है कि उन सभी छोटी-मोटी धार्मिक कविताओंको गीति- काव्य कहते हैं जो संगीतके स्वरोंमें आबद्ध हो सकती हैं और छन्दकी निश्चित मात्राओंमें अपनेको नहीं बाँधतीं। इस स्वरूपकी यह विशेषता है कि विशेष मनोवेगोंको प्रकट करनेके लिए तथा दूसरेके हृदयमें भी उन्हीं मनोवेगोंको उत्पन्न करनेके लिए समय और परिस्थितिके अनुकूल राग-रागनियोंका आधार लिया जाता है १। १. किन्तु विनयके पदोंसे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि कविने अपने विशेष मनोवेगोंको समय और परिस्थितिके अनुकूल राग-रागिनियोंका आधार लेकर प्रकट तो अवश्य किया है, पर दूसरेके हृदयमें उन मनोवेगोंको उत्पन्न करनेके लिए नहीं। क्योंकि यदि

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