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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariAwadhipublished475 pages

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२० विनय-पत्रिका शब्दार्थ - उमाकन्त = शिवजी । तनुदुति = शरीरकी कान्ति । चम्पक = चम्पा । कदलि = केला । केहरि = सिंह । मराल = हंस । प्रसून = पुष्प । विहँग = पक्षी । बकुल = मौलसिरी । रसाल = आम । श्रीफल = बेल । कंचुकि = चोली । कच = बाल । पिक = कोयल । वरहि = मोर । कीर = तोता । सित = सफेद । पंचवान = कामदेव । भावार्थ - हे शिवजी, देखिये, देखिये ! आज आप वन बने हैं। मानो आपको देखनेके लिए वसन्त ऋतु आयी है। (शिवजीके अर्द्धांगमें जो पार्वती- जी विराजमान हैं, वही मानो वसन्त ऋतु हैं) ॥१॥ महारानीजीके शरीरकी कान्ति मानो चम्पाके फूलोंकी माला है और श्रेष्ठ नीले वस्त्र नवीन तमाल-पत्र हैं ॥२॥ सुन्दर जंघाएँ केलेके वृक्ष और चरण लाल कमल हैं। कमर सिंहकी और चाल हंसकी सूचना दे रही है ॥३॥ गहने रंग-बिरंगे अनेक तरहके फूल हैं। नूपुर (पैजनी) और किंकिनि (करधनी) का मधुर शब्द पक्षियोंका शब्द है ॥४॥ हाथ मौलसिरी और आमकी नवीन कोंपल हैं। स्तन ही बेल हैं और चोली लताओंका जाल है ॥५॥ जगन्माताका मुख कमल है और उनके सिरके बाल गुंजारते हुए भौंरे हैं। उनके बड़े-बड़े नेत्र नवीन नीले कमल हैं ॥६॥ मधुरवाणी कोयल है और चरित्र सुन्दर मोर तथा तोते हैं। हँसी सफेद फूल और लीला शीतल-मन्द-सुगन्ध त्रिविध वायु है ॥७॥ तुलसीदास कहते हैं कि हे परम ज्ञानी शिवजी ! सुनिये, इस कामदेवने मेरे हृदयमें वासकर बड़ा प्रपंच रच रखा है ॥८॥ इस कामके भ्रम-फन्दको हटा दीजिये, जिसमें मेरे हृदयमें सुखकी राशि श्रीरामजी निवास करें ॥९॥ विशेष १-इस पदमें गोस्वामीजीने अर्द्धनारी-नटेश्वर शिव-पार्वतीका वर्णन वन और वसन्तका रूपक बाँधकर किया है। भक्तशिरोमणि गोस्वामीजीको मातेश्वरी पार्वतीजीका स्पष्टतया नख-शिख वर्णन करना अनुचित जान पड़ा, इसलिए उन्होंने इस अनूठे ढंगसे काम लिया है। इस रूपकमें कवि-कुल- चूडामणि तुलसीदासजीने कमाल किया है। वनकी कोई भी वस्तु छूटने नहीं पायी है। वृक्ष, लता, पत्र, पुष्प, सिंह, हंस, पक्षी, भ्रमर सब मौजूद हैं। यहाँतक कि कमलका लाल, पीला और नीला रङ्ग भी नहीं छूटने पाया है।