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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariAwadhipublished475 pages

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२८ विनय-पत्रिका करके सतोगुण उत्पन्न करनेवाला) और सुन्दर जल ब्रह्माके कमण्डलुमें भरा रहता है। तुमने शिवजीके मस्तकको ही अपना घर बना रखा है। हे अनन्त नामवाली जाह्नवी ! तुमने राजा सगरके साठ हजार पुत्रोंको धन्य और पवित्र कर दिया है। तुमने पहाड़ोंकी कन्दराओंको विदीर्ण कर डाला है ॥२॥ बड़े पुण्यके फलसे यक्ष, गन्धर्व, मुनि, किन्नर, नाग, दैत्य और मनुष्य अपनी स्त्रियोंके सहित तुम्हारे जलमें स्नान करते हैं। तुम स्वर्गकी सीढ़ी हो और ज्ञान-विज्ञान- दायिनी हो। तुम मोह, मद और कामरूपी कमलोंके नाशके लिए शिशिर ऋतुकी रात हो ॥३॥ तुम्हारे दोनों सुन्दर किनारोंपर हरे और घने बेंतके वृक्ष हैं और बीचमें संसारको प्रसन्न करनेवाली उज्ज्वल धारा है; यह दृश्य ऐसा प्रतीत होता है कि मानों नीले पलंगपर शेषनाग सो रहे हैं। हे देवताओंकी स्वामिनी श्रीगंगाजी ! तुम्हारे हजारों स्रोत शेषनागके हजार मस्तकके समान हैं ॥४॥ हे त्रिपथगे ! तुम्हारी महिमा अपार है, रूप असंख्य हैं, तुम राजाओंकी मुकुट- मणियोंसे वन्दनीय हो। हे माता ! हे शिव-प्रिये ! तुम भयको हरनेवाली हो; तुलसीदासको श्रीरामजीके चरणोंमें पूर्ण प्रीति दो ॥५॥ विशेष 'जन्हुकन्याधन्य'—पद १७ के विशेष में देखिये। १—'नील पर्यङ्क'—इस पूरी पंक्तिमें उत्प्रेक्षालङ्कार है। दोनों किनारोंका हरित गम्भीर बेत वृक्ष ही नीला पलंग है; गङ्गाजीकी धवल धारा मानो शेषनाग है; क्योंकि शेषका वर्ण उज्ज्वल है और गङ्गाकी धारा भी उज्ज्वल है। गङ्गा भी हजारों धाराओंसे समुद्रमें मिली हैं; अतः वे धाराएँ ही मानो शेष- नागके हजार फन हैं। २—'भव-भामिनी'—हिमवानके दो कन्याएँ हुईं। बड़ीका नाम गङ्गाजी और छोटीका नाम उमा था। गङ्गाजीको लोक-कल्याणार्थ देवता लोग माँग ले गये और उमाका विवाह शिवजीके साथ हुआ। जब बहुत दिनोंतक उमासे कोई सन्तान नहीं हुई, तब शिवजीने सन्तानोत्पत्ति के लिए तेज छोड़ा। उस तेजको श्रीगङ्गाजीने धारण किया। उससे कार्त्तिकेयकी उत्पत्ति हुई। देवताओं- ने उनके दूध पिलानेका भार षट्कृत्तिकाको दिया। षट्कृत्तिकाने उनके