विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
by गोस्वामी तुलसीदास
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Read in context३० विनय-पत्रिका विशेष १—यहाँ प्रारम्भमें लिखा है कि गंगाजीके स्मरणमात्रसे ही तीनों तरहके ताप दूर हो जाते हैं। अतः गोसाईंजीने आगे 'सोहत ससि...चरित' में ही स्मरणके लिए गंगाजीका स्वरूप भी दिखा दिया है। भविष्य पुराणमें गंगाजीका ध्यान करनेके लिए उनके स्वरूपका बृहद् वर्णन है। ( २० ) ईस-सीस बससि, त्रिपथ लससि, नभ-पताल-धरनि। सुर-नर-मुनि-नाग-सिद्ध-सुजन-मंगल-करनि ॥१॥ देखत दुख-दोष-दुरित-दाह-दारिद-दरनि। सगर-सुवन-साँसति-समनि, जलनिधि जल-भरनि ॥२॥ महिमा की अवधि करसि बहु विधि-हरि-हरनि। तुलसी करु बानि विमल, विमल बारि बरनि ॥३॥ शब्दार्थ—ईस = शिवजी। दुरित = पाप। दाह = त्रिताप। दरनि = नाश करने- वाली। साँसति = क्लेश। बरनि = वर्ण या रङ्ग। भावार्थ—तुम शिवजीके मस्तकपर रहती हो और आकाश, पाताल तथा पृथिवी—इन तीनों मार्गोंमें सुशोभित हो। देवता, मनुष्य, मुनि, नाग, सिद्ध और सुजनोंका तुम कल्याण करनेवाली हो ॥१॥ तुम्हारे दर्शनमात्रसे ही दुःखों, दोषों, पापों, तापों और दरिद्रताका नाश हो जाता है। तुम सगर-पुत्रोंके क्लेशों- का नाश करनेवाली और समुद्रमें जल भरनेवाली हो ॥२॥ तुमने ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी महिमाकी सीमा बहुत बढ़ा दी है। हे मातेश्वरी गंगे ! जिस प्रकार तुम्हारे जलका वर्ण निर्मल है, उसी प्रकार तुलसीदासकी वाणीको भी तुम निर्मल कर दो जिससे वह श्रीरामजीके चरितका गान कर सके। विशेष १—'विधि-हरि-हरनि'—ब्रह्माके कमण्डलुमें रहनेके कारण गङ्गाजीने ब्रह्मकमण्डली, विष्णुके चरणोंसे निकलनेके कारण विष्णुपदी तथा शिवजीके मस्तकपर रहनेके कारण शिवजटा-विहारिणी नाम धारण किया। इससे तीनों देवताओंका महत्त्व चरम सीमापर पहुँच गया है।