विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
by गोस्वामी तुलसीदास
Page 63 of 475
Read in contextचला जाता था, किन्तु कर्णके बाणसे अर्जुनका रथ कई अंगुलमात्र हटकर रह जाता था। इसपर सारथी रूपमें बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्ण हर बार कहा करते, धन्य हो कर्ण ! भगवान्का यह वचन अर्जुनके लिए असह्य हो उठा। उन्होंने सोचा कि मेरे बाणसे कर्णका रथ इतनी दूर चला जानेपर भी श्रीकृष्णने मुझे एक बार भी शाबासी नहीं दी, किन्तु उनके बाणसे मेरा रथ कुछ अंगुल खिसकनेपर ही यह हर बार उसकी प्रशंसा करते हैं। अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनका यह भाव समझ गये। उन्होंने हनुमानजीसे ध्वजा छोड़कर हट जानेके लिए इशारा किया। हनुमानजीके हटते ही कर्णके बाणसे अर्जुनका रथ बहुत दूर जा गिरा। अर्जुनने व्याकुल होकर भगवान्से इसका कारण पूछा। भगवान्ने कहा,-हनुमानजीके पराक्रमसे तुम्हारा रथ स्थिर रहता है, इस समय वह ध्वजाके ऊपरसे हट गये हैं। कुशल थी कि मैं बैठा हुआ था; नहीं तो तुम्हारा रथ न-जानें कहाँ जाकर गिरता। भगवान्की बात सुनकर अर्जुनका अभिमान दूर हो गया। स्कन्दपुराणमें लिखा है कि एक बार विष्णु भगवान्ने हनुमानजीको बुलाने- के लिए गरुड़से कहा। हनुमानने गरुड़से कहा,-आप चलें, मैं थोड़ी देरके बाद यहाँसे चलूँगा। गरुड़ने साथ ही चलनेके लिए कहा। हनुमानने कहा,- पीछे चलनेपर भी मैं आपसे पहले वहाँ पहुँच जाऊँगा। गरुड़को यह बात बहुत बुरी लगी, क्योंकि उन्हें अपनी तीव्र गतिका बड़ा गर्व था। वह शीघ्र पहुँचनेके लिए बड़ी तेजीसे चले। उन्होंने भगवान्के पास पहुँचकर देखा :-हनुमानजी विराजमान हैं। यह देखकर वह बहुत लज्जित हुए। ३-'करनलिपि'-हनुमानजीने सूर्य भगवान्से विद्याध्ययन किया था। इन्होंने वेदों और शास्त्रोंपर भाष्य, पिंगलकी टीका तथा वेदांगोंपर भी कई ग्रंथ लिखे थे। हनुमन्नाटक, हनुमत् ज्योतिष आदि कई ग्रंथ आज भी संस्कृत साहित्यमें उपलब्ध हैं।—चित्रकाव्यके आदि आविष्कारक भी यही थे। ४-'सम्पाति'-यह गीधराज जटायुका छोटा भाई था। एक दिन दोनों भाई होड़ लगाकर सूर्यको छूनेके लिए आकाशमें उड़े। जटायु बुद्धिमान् था, इसलिए वह सूर्यमण्डलके समीप जाकर उनका तेज न सह सकनेके कारण लौट आया—; परन्तु अभिमानी सम्पाति आगे ही बढ़ता गया। परिणाम यह