यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextचालीसवां अध्याय ईशा वास्यमिद १७ सर्वं यत्किं च जगत्यां जगत्. तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्.. (१) इस जड़चेतन जगत् में जो कुछ भी है, वह ईश्वर की कृपा से है. उस ईश्वर के द्वारा त्यागे गए का भोग कीजिए. बहुत ज्यादा लालच मत करो. यह धनादि सब किस का है ? ( अर्थात् ईश्वर के अलावा किसी का नहीं ). ( १ ) कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत १४ समाः. एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे.. (२) हे ईश्वर! हम कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करें. इस के अलावा कल्याण का कोई अन्य मार्ग नहीं है. कर्म मनुष्य को लिप्त नहीं करते. ( २ ) असुर्या नाम ते लोका ऽ अन्धेन तमसावृताः. ताँस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः.. (३) जो गहन अंधकार से घिरे रहते हैं, वे लोग असुर्य कहलाते हैं. जो आत्मा का हनन करने वाले हैं, वे लोग प्रेत रूप में वैसे ही लोकों को प्राप्त होते हैं. ( ३ ) अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा ऽ आप्नुवन् पूर्वमर्षत्. तद्धावतोन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति.. (४) अजन्मा ईश्वर एक है. वह मन से भी ज्यादा गतिवान और फुरतीला है. देवगण भी इसे प्राप्त नहीं कर पाते हैं. स्थिर रह कर भी वह दौड़ता हुआ गतिशीलों को पछाड़ देता है. वह जल में रहता है. वायु को धारण करता है. ( ४ ) तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके. तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः.. (५) वह ( परम तत्त्व ) गतिशील है और स्थिर भी है. वह दूर भी है और निकट भी है वह जड़ और चेतन दोनों के भीतर भी है और बाहर भी है. ( ५ ) यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्नेवानुपश्यति. सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न वि चिकित्सति.. (६) यजुर्वेद - ४१७