यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextद्वितीय अध्याय ६५ निष्कर्ष- प्रायः कुछ लोग कहते हैं कि दूसरे अध्याय में गीता पूर्ण हो गयी; किन्तु यदि केवल कर्म का नाम मात्र लेने से कर्म पूरा हो जाता हो, तब तो गीता का समापन माना जा सकता है। इस अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने यही बताया कि- अर्जुन! निष्काम कर्मयोग के विषय में सुन, जिसे जानकर तू संसार- बन्धन से छूट जायेगा। कर्म करने में तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं। कर्म करने में तेरी अश्रद्धा भी न हो। निरन्तर करने के लिये तत्पर हो जा। इसके परिणाम में तू 'परं दृष्ट्वा' (२/५९)- परमपुरुष का दर्शन कर स्थितप्रज्ञ बनेगा, परमशान्ति पायेगा। किन्तु यह नहीं बताया कि 'कर्म' है क्या? यह 'सांख्ययोग' नामक अध्याय नहीं है। यह नाम शास्त्रकार का नहीं, अपितु टीकाकारों की देन है। वे अपनी बुद्धि के अनुसार ही ग्रहण करते हैं तो आश्चर्य क्या है? इस अध्याय में कर्म की गरिमा, उसे करने में बरती जानेवाली सावधानी और स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मन में कर्म के प्रति उत्कण्ठा जागृत की है, उसे कुछ प्रश्न दिये हैं। आत्मा शाश्वत है, सनातन है, उसे जानकर तत्त्वदर्शी बनो। उसकी प्राप्ति के दो साधन हैं-ज्ञानयोग और निष्काम कर्मयोग। अपनी शक्ति को समझकर, हानि-लाभ का स्वयं निर्णय लेकर कर्म में प्रवृत्त होना ज्ञानमार्ग है तथा इष्ट पर निर्भर होकर समर्पण के साथ उसी कर्म में प्रवृत्त होना निष्काम कर्ममार्ग या भक्तिमार्ग है। गोस्वामी तुलसीदास ने दोनों का चित्रण इस प्रकार किया है- मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी।। जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही।। (रामचरितमानस, ३/४२/८-९) मेरे दो प्रकार के भजनेवाले हैं- एक ज्ञानमार्गी, दूसरा भक्तिमार्गी। निष्काम कर्ममार्गी या भक्तिमार्गी शरणागत होकर मेरा आश्रय लेकर चलता