यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context६६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता है। ज्ञानयोगी अपनी शक्ति सामने रखकर, अपने हानि-लाभ का विचार कर अपने भरोसे चलता है, जबकि दोनों के शत्रु एक ही हैं। ज्ञानमार्गी को काम, क्रोधादि शत्रुओं पर विजय पाना है और निष्काम कर्मयोगी को भी इन्हीं से युद्ध करना है। कामनाओं का त्याग दोनों करते हैं और दोनों मार्गों में किया जानेवाला कर्म भी एक ही है। “इस कर्म के परिणाम में परमशान्ति को प्राप्त हो जाओगे।”- लेकिन यह नहीं बताया कि कर्म है क्या? अब आपके भी समक्ष ‘कर्म’ एक प्रश्न है। अर्जुन के मन में भी कर्म के प्रति जिज्ञासा हुई। तीसरे अध्याय के आरम्भ में ही उसने कर्मविषयक प्रश्न प्रस्तुत किया। अतः- ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे ‘कर्मजिज्ञासा’ नाम द्वितीयोऽध्यायः।।२।। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में ‘कर्म-जिज्ञासा’ नामक दूसरा अध्याय पूर्ण होता है। इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः ‘यथार्थगीता’ भाष्ये ‘कर्मजिज्ञासा’ नाम द्वितीयोऽध्यायः।।२।। इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्द जी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के भाष्य ‘यथार्थ गीता’ में ‘कर्म-जिज्ञासा’ नामक दूसरा अध्याय पूर्ण होता है। ।। हरिः ॐ तत्सत् ।।