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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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तृतीय अध्याय ७१ शरीरों की ही तो यात्रा कर रहा है। कर्म कोई ऐसी वस्तु है जो इस यात्रा को सिद्ध कर देती है, पूर्ण कर देती है। मान लें, एक ही जन्म लेना पड़ा तो यात्रा जारी है, अभी तो पथिक चल ही रहा है। वह दूसरे शरीरों की यात्रा कर रहा है। यात्रा पूर्ण तब होती है जब ‘गन्तव्य’ आ जाय। परमात्मा में स्थिति के अनन्तर इस आत्मा को शरीरों की यात्रा नहीं करनी पड़ती अर्थात् शरीर-त्याग और शरीर-धारण वाला क्रम समाप्त हो जाता है। अतः कर्म कोई ऐसी वस्तु है कि इस पुरुष को पुनः शरीरों की यात्रा नहीं करनी पड़ती। ‘मोक्ष्यसेऽशुभात्’ (गीता, ४/१६)- अर्जुन! इस कर्म को करके तू संसार-बन्धन ‘अशुभ’ से छूट जायेगा। कर्म कोई ऐसी वस्तु है जो संसार-बन्धन से मुक्ति दिलाती है। अब प्रश्न खड़ा होता है कि वह निर्धारित कर्म है क्या? इस पर कहते हैं- यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर।।९।। अर्जुन! यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। वह हरकत कर्म है, जिससे यज्ञ पूर्ण होता है। सिद्ध है कि कर्म एक निर्धारित प्रक्रिया है। इसके अतिरिक्त जो कर्म होते हैं, क्या वे कर्म नहीं हैं? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, वे कर्म नहीं हैं। ‘अन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः’- इस यज्ञ की प्रक्रिया के अतिरिक्त दुनिया में जो कुछ भी किया जाता है, सारा जगत् जिसमें रात-दिन व्यस्त है वह इसी लोक का एक बन्धन है, न कि कर्म। कर्म तो ‘मोक्ष्यसेऽशुभात्’- अशुभ अर्थात् संसार-बन्धन से छुटकारा दिलानेवाला है। मात्र यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। वह हरकत कर्म है, जिससे यज्ञ पूरा होता है। अतः अर्जुन! उस यज्ञ की पूर्ति के लिए संगदोष से अलग रहकर भली प्रकार कर्म का आचरण कर। संगदोष से अलग हुए बिना यह कर्म होता ही नहीं। अब हम समझ गये कि यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है; किन्तु यहाँ पुनः एक नवीन प्रश्न उत्पन्न हो गया कि वह यज्ञ क्या है, जिसे किया जाय? इसके लिये पहले यज्ञ को न बताकर श्रीकृष्ण बताते हैं कि यज्ञ आया कहाँ से? वह देता क्या है? उसकी विशेषताओं पर प्रकाश डाला और चौथे अध्याय में जाकर स्पष्ट किया कि यज्ञ क्या है, जिसे हम कार्यरूप दें और हमसे कर्म होने