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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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७२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता लगे। योगेश्वर श्रीकृष्ण की शैली से स्पष्ट है कि जिस वस्तु का चित्रण करना है, वे पहले उसकी विशेषताओं का चित्रण करते हैं जिससे श्रद्धा जागृत हो, तत्पश्चात् वे उसमें बरती जानेवाली सावधानियों पर प्रकाश डालते हैं और अन्त में मुख्य सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं। स्मरण रहे कि यहाँ पर श्रीकृष्ण ने कर्म के दूसरे अंग पर प्रकाश डाला कि कर्म एक निर्धारित क्रिया है। जो कुछ किया जाता है, वह कर्म नहीं है। अध्याय दो में पहली बार कर्म का नाम लिया, उसकी विशेषताओं पर बल दिया, उसमें बरती जानेवाली सावधानियों पर प्रकाश डाला, लेकिन यह नहीं बताया कि कर्म क्या है? यहाँ अध्याय तीन में बताया कि कोई बगैर कर्म किये नहीं रहता। प्रकृति से पराधीन होकर मनुष्य कर्म करता है। इसके बावजूद भी जो लोग इन्द्रियों को हठ से रोककर मन से विषयों का चिन्तन करते हैं वे दम्भी हैं-दम्भ का आचरण करनेवाले हैं। इसलिये अर्जुन ! मन से इन्द्रियों को समेटकर तू कर्म कर। किन्तु प्रश्न ज्यों-का-त्यों है कि कौन-सा कर्म करे? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन ! तू निर्धारित किये हुए कर्म को कर। अब प्रश्न उठता है कि निर्धारित कर्म क्या है, जिसे हम करें? तब बताया कि यज्ञ को कार्यरूप देना कर्म है। अब प्रश्न उठता है कि वह यज्ञ क्या है? यहाँ यज्ञ की उत्पत्ति, विशेषता बताकर शान्त हो जायेंगे और आगे अध्याय चार में यज्ञ का निखरा हुआ रूप मिलेगा, जिसे करना कर्म है। कर्म की यह परिभाषा गीता को समझने की कुंजी है। यज्ञ के अतिरिक्त दुनिया में लोग कुछ-न-कुछ करते ही रहते हैं। कोई खेती करता है तो कोई व्यापार, कोई पदासीन है तो कोई सेवक, कोई अपने को बुद्धिजीवी कहता है तो कोई श्रमजीवी, कोई समाज-सेवा को कर्म मानता है तो कोई देश-सेवा को और इन्हीं कर्मों में लोग सकाम और निष्काम कर्म की भूमिका भी बनाये पड़े हैं। किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं, ये कर्म नहीं हैं। 'अन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः'- यज्ञ की प्रक्रिया के सिवाय जो कुछ भी किया जाता है वह इसी लोक का