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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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७४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता पहले से ही हैं; किन्तु अस्त-व्यस्त एवं विकृत हैं। यज्ञ के अनुरूप उन्हें ढालना ही रचना या सजाना है। ऐसे महापुरुष ने कल्प के आदि में यज्ञसहित प्रजा की रचना की। कल्प नीरोग बनाता है। वैद्य कल्प देते हैं, कोई कायाकल्प कराता है। यह क्षणिक शरीरों का कल्प है। वास्तविक कल्प तो तब है, जब भवरोग से मुक्ति मिल जाय। आराधना का प्रारम्भ इस कल्प की शुरुआत है। आराधना पूर्ण हुई तो आपका कल्प पूरा हो गया। इस प्रकार परमात्मस्वरूपस्थ महापुरुषों ने भजन के प्रारम्भ में यज्ञसहित संस्कारों को सुसंगठित कर कहा कि इस यज्ञ से तुम वृद्धि को प्राप्त होओ। कैसी वृद्धि? क्या मकान कच्चे से पक्का बन जायेगा? क्या आय अधिक होने लगेगी? नहीं, यह यज्ञ 'इष्टकामधुक्'- इष्ट-सम्बन्धी कामना की पूर्ति करेगा। इष्ट है परमात्मा, उस परमात्मा-सम्बन्धी कामना की पूर्तिवाला है। प्रश्न स्वाभाविक है कि यज्ञ सीधे उस परमात्मा की प्राप्ति करा देगा अथवा क्रम-क्रम से चलकर?- देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ।।११।। इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो अर्थात् दैवी सम्पद् की वृद्धि करो। वे देवता लोग तुम लोगों की उन्नति करेंगे। इस प्रकार आपस में वृद्धि करते हुए परमश्रेय, जिसके बाद कुछ भी पाना शेष न रहे, ऐसे परमकल्याण को प्राप्त हो जाओ। ज्यों-ज्यों हम यज्ञ में प्रवेश करेंगे, (आगे यज्ञ का अर्थ होगा- आराधना की विधि) त्यों-त्यों हृदय-देश में दैवी सम्पद् अर्जित होती चली जायेगी। परमदेव एकमात्र परमात्मा है, उस परमदेव में प्रवेश दिला देनेवाली जो सम्पद् है, अन्तःकरण की जो सजातीय प्रवृत्ति है उसी को 'दैवी सम्पद्' कहते हैं। वह परमदेव को सम्भव करती है इसलिये दैवी सम्पद् कही जाती है, न कि बाहरी देवता-पत्थर-पानी, जैसा कि लोग कल्पना कर लेते हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण के शब्दों में उनका कोई अस्तित्व नहीं है। आगे कहते हैं-