यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
Page 110 of 429
Read in contextतृतीय अध्याय ७५ इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥१२॥ यज्ञ द्वारा संवर्धित देवता (दैवी सम्पद्) आपको 'इष्टान् भोगान् हि दास्यन्ते'– इष्ट अर्थात् आराध्य-सम्बन्धी भोगों को देंगे, अन्य कुछ नहीं। 'तैः दत्तान्'- वे ही एकमात्र देनेवाले हैं। इष्ट को पाने का अन्य कोई विकल्प नहीं है। इन दैवी गुणों को बिना बढ़ाये जो इस स्थिति का भोग करता है वह निश्चय ही चोर है। जब उसने पाया ही नहीं तो भोगेगा क्या? किन्तु कहता अवश्य है कि हम तो पूर्ण हैं, तत्त्वदर्शी हैं। ऐसी डींग मारनेवाला इस पथ से मुँह छिपानेवाला है। वह निश्चय ही चोर है, न कि प्राप्तिवाला। किन्तु पानेवाले क्या पाते हैं?- यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥१३॥ यज्ञ से बचे हुए अन्न को खानेवाले सन्तजन सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। दैवी सम्पद् की वृद्धि करते-करते परिणाम में प्राप्तिकाल ही पूर्तिकाल है। जब यज्ञ पूर्ण हो गया तो शेष बचा हुआ ब्रह्म ही अन्न है। इसी को श्रीकृष्ण ने दूसरे शब्दों में कहा- 'यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।'- यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है उस अशन का पान करनेवाला ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाता है। यहाँ वे कहते हैं कि यज्ञ से शेष बचे हुए अशन का (ब्रह्मपीयूष का) पान करनेवाला सब पापों से छुटकारा पा जाता है। सन्तजन तो छूट जाते हैं; किन्तु पापी लोग मोह के माध्यम से उत्पन्न शरीरों के लिये पचते हैं। वे पाप खाते हैं। उन्होंने भजन भी किया, आराधना को समझा, अग्रसर भी हुए; किन्तु बदले में एक मीठी-सी चाह पैदा हो गयी कि 'आत्मकारणात्'- शरीर के लिये और शरीर के सम्बन्धों को लेकर कुछ मिले। उसे मिल तो जायेगा; किन्तु उतने भोग के पश्चात् वह अपने को वहीं खड़ा पायेगा, जहाँ से चलना प्रारम्भ किया था। इससे बड़ी क्षति क्या होगी? जब शरीर ही नश्वर है तो इसके सुख-भोग कब तक साथ देंगे? वे आराधना तो करते हैं, किन्तु बदले में पाप ही खाते हैं।
- 'पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।' (रामचरितमानस, ७/४३/२) वह