यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context७६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता नष्ट तो नहीं होगा; किन्तु आगे नहीं बढ़ेगा। इसलिये श्रीकृष्ण निष्काम भाव से कर्म (भजन) करने पर बल देते हैं। अभी तक श्रीकृष्ण ने बताया कि यज्ञ परमश्रेय देता है और उसकी रचना महापुरुष द्वारा होती है। किन्तु वे महापुरुष प्रजा की रचना में क्यों प्रवृत्त होते हैं? इस पर कहते हैं- अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः।।१४।। कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।।१५।। सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं। 'अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।' (तैत्तिरीयोपनिषद्, भृगुवल्ली २) अन्न परमात्मा ही है। उस ब्रह्मपीयूष को ही उद्देश्य बनाकर प्राणी यज्ञ की ओर अग्रसर होता है। अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है। बादलों से होनेवाली वर्षा नहीं अपितु कृपावृष्टि। पूर्वसंचित यज्ञ-कर्म ही इस जन्म में, जहाँ से साधन छूटा था, वहीं से इष्टकृपा के रूप में बरस पड़ता है। आज की आराधना कल कृपा के रूप में मिलेगी। इसीलिये वृष्टि यज्ञ से होती है। स्वाहा बोलने और तिल-जौ जलाने से ही वृष्टि होती तो विश्व की अधिकांश मरुभूमि ऊसर क्यों रहती, उर्वरा बन जाती। यहाँ कृपावृष्टि यज्ञ की देन है। यह यज्ञ कर्मों से ही उत्पन्न होनेवाला है। कर्म से यज्ञ पूर्ण होता है। इस कर्म को वेद से उत्पन्न हुआ जान। वेद ब्रह्मस्थित महापुरुषों की वाणी है। जो तत्त्व विदित नहीं है उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति का नाम वेद है, न कि कुछ श्लोक-संग्रह। वेद अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। कहा तो महात्माओं ने; किन्तु वे परमात्मा के साथ तद्रूप हो चुके हैं, उनके माध्यम से अविनाशी परमात्मा ही बोलता है इसलिये वेद को अपौरुषेय कहा जाता है। महापुरुष वेद कहाँ से पा गये? तो वेद अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ। वे महापुरुष उसके तद्रूप हैं, वे मात्र यन्त्र हैं इसलिये उनके द्वारा वही बोलता है। क्योंकि यज्ञ के द्वारा ही मन के निरोधकाल में वह विदित होता है। इससे सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सर्वदा यज्ञ में ही प्रतिष्ठित है। यज्ञ ही उसे पाने का एकमात्र उपाय है। इसी पर बल देते हैं-