यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextतृतीय अध्याय ७७ एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥१६॥ हे पार्थ! जो पुरुष इसी लोक में मनुष्य-शरीर प्राप्त कर इस प्रकार चलाये हुए साधन-चक्र के अनुसार नहीं बरतता अर्थात् दैवी सम्पद् का उत्कर्ष, देवताओं की वृद्धि और परस्पर वृद्धि के द्वारा अक्षयधाम को प्राप्त करना- इस क्रम के अनुसार जो नहीं बरतता, इन्द्रियों का आराम चाहनेवाला वह पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है। बन्धुओ! योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अध्याय दो में कर्म का नाम लिया और इस अध्याय में बताया कि नियत कर्म का आचरण कर। यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। इसके सिवाय जो कुछ किया जाता है, वह इसी लोक का बन्धन है। इसीलिये संग-दोष से अलग रहकर उस यज्ञ की पूर्ति के लिये कर्म का आचरण कर। उन्होंने यज्ञ की विशेषताओं पर प्रकाश डाला और बताया कि यज्ञ की उत्पत्ति ब्रह्मा से है। प्रजा अन्न को उद्देश्य बनाकर उस यज्ञ में प्रवृत्त होती है। यज्ञ कर्म से और कर्म अपौरुषेय वेद से उत्पन्न होता है, जबकि वेदमन्त्रों के द्रष्टा महापुरुष ही थे। उनका पुरुष तिरोहित हो चुका था, प्राप्ति के साथ अविनाशी परमात्मा ही शेष बचा था इसलिये वेद परमात्मा से उत्पन्न है। सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ में सर्वदा प्रतिष्ठित है। इस साधन-चक्र के अनुसार जो नहीं बरतता, वह पापायु पुरुष इन्द्रियों का सुख चाहनेवाला है, व्यर्थ ही जीता है। अर्थात् यज्ञ ऐसी विधि-विशेष है, जिसमें इन्द्रियों का आराम नहीं है अपितु अक्षय सुख है। इन्द्रियों के संयम के साथ इसमें लगने का विधान है। इन्द्रियों का आराम चाहनेवाले पापायु हैं। अभी तक श्रीकृष्ण ने नहीं बताया है कि यज्ञ है क्या? परन्तु क्या यज्ञ करते ही रहेंगे या इसका कभी अन्त भी होगा? इस पर योगेश्वर कहते हैं- यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥१७॥ परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रत, आत्मतृप्त और आत्मा में ही सन्तुष्ट है, उसके लिये कोई कर्त्तव्य नहीं रह जाता। यही तो लक्ष्य था। जब अव्यक्त,