Skip to content
BharatKosha
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

Page 126 of 429

Read in context
Page 126

तृतीय अध्याय ९१ शत्रु तो इनके अन्तराल में छिपा है। वह तुम्हारे शरीर के भीतर है। बाहर खोजने से वह कहीं नहीं मिलेगा। यह हृदय-देश की, अन्तर्जगत् की लड़ाई है। इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान और विज्ञान का नाश करनेवाले इस पापी काम को ही मार। काम सीधे पकड़ में नहीं आयेगा अतः विकारों के निवास-स्थान का ही घेराव कर लो, इन्द्रियों को ही संयत कर लो। किन्तु इन्द्रियों और मन को संयत करना तो बड़ा कठिन है, क्या यह हम कर पायेंगे? इस पर श्रीकृष्ण आपकी सामर्थ्य बताते हुए प्रोत्साहित करते हैं- इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः।।४२।। अर्जुन ! इस शरीर से तू इन्द्रियों को परे अर्थात् सूक्ष्म और बलवान् जान। इन्द्रियों से परे मन है, यह उनसे भी बलवान् है। मन से परे बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त परे है, वह तुम्हारी आत्मा है। वही हो तुम। इसलिये इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि का निरोध करने में तुम सक्षम हो। एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना। जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।४३।। इस प्रकार बुद्धि से परे अर्थात् सूक्ष्म और बलवान् अपने आत्मा को जानकर, आत्मबल को समझकर, बुद्धि के द्वारा अपने मन को वश में करके अर्जुन ! इस कामरूपी दुर्जय शत्रु को मार। अपनी शक्ति को समझकर इस दुर्जय शत्रु को मार। काम एक दुर्जय शत्रु है। इन्द्रियों के द्वारा यह आत्मा को मोहित करता है, तो अपनी शक्ति समझकर, आत्मा को बलवान् समझकर कामरूपी शत्रु को मार। कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह शत्रु आन्तरिक है और युद्ध भी अन्तर्देश का ही है। निष्कर्ष- बहुधा गीताप्रेमी व्याख्याताओं ने इस अध्याय को 'कर्मयोग' नाम दिया है; किन्तु यह संगत नहीं है। दूसरे अध्याय में योगेश्वर ने कर्म का नाम लिया। उन्होंने कर्म के महत्त्व का प्रतिपादन कर उसमें कर्मजिज्ञासा जागृत की और