यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context९० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च। यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥३८॥ जैसे धुएँ से अग्नि और मल से दर्पण ढँक जाता है, जैसे जेर से गर्भ ढँका हुआ है, ठीक वैसे ही काम-क्रोधादि विकारों से यह ज्ञान ढँका हुआ है। भींगी लकड़ी जलाने पर धुआँ-ही-धुआँ होता है। अग्नि रहकर भी लपट का रूप नहीं ले पाती। मल से ढँके दर्पण पर जिस प्रकार प्रतिबिम्ब स्पष्ट नहीं होता, झिल्ली के कारण जिस प्रकार गर्भ ढँका रहता है, वैसे ही इन विकारों के रहते परमात्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता। आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा। कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३९॥ कौन्तेय! अग्नि के समान भोगों से न तृप्त होनेवाले, ज्ञानियों के निरन्तर बैरी इस काम से ज्ञान ढँका हुआ है। अभी तो श्रीकृष्ण ने काम और क्रोध दो शत्रु बताये। प्रस्तुत श्लोक में वे केवल एक शत्रु काम का नाम लेते हैं। वस्तुतः काम में क्रोध का अन्तर्भाव है। कार्य पूर्ण होने पर क्रोध समाप्त हो जाता है; किन्तु कामना समाप्त नहीं होती। कामना-पूर्ति में व्यवधान पड़ते ही क्रोध पुनः उभर आता है। काम के अन्तराल में क्रोध भी निहित है। इस शत्रु का निवास कहाँ है? इसे ढूँढ़े कहाँ? निवास जान लेने पर इसे समूल नष्ट करने में सुविधा रहेगी। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते। एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४०॥ इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोह में डालता है। तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ। पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१॥ इसलिए अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को ‘नियम्य’– संयत कर; क्योंकि