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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages
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९० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च। यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥३८॥ जैसे धुएँ से अग्नि और मल से दर्पण ढँक जाता है, जैसे जेर से गर्भ ढँका हुआ है, ठीक वैसे ही काम-क्रोधादि विकारों से यह ज्ञान ढँका हुआ है। भींगी लकड़ी जलाने पर धुआँ-ही-धुआँ होता है। अग्नि रहकर भी लपट का रूप नहीं ले पाती। मल से ढँके दर्पण पर जिस प्रकार प्रतिबिम्ब स्पष्ट नहीं होता, झिल्ली के कारण जिस प्रकार गर्भ ढँका रहता है, वैसे ही इन विकारों के रहते परमात्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता। आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा। कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३९॥ कौन्तेय! अग्नि के समान भोगों से न तृप्त होनेवाले, ज्ञानियों के निरन्तर बैरी इस काम से ज्ञान ढँका हुआ है। अभी तो श्रीकृष्ण ने काम और क्रोध दो शत्रु बताये। प्रस्तुत श्लोक में वे केवल एक शत्रु काम का नाम लेते हैं। वस्तुतः काम में क्रोध का अन्तर्भाव है। कार्य पूर्ण होने पर क्रोध समाप्त हो जाता है; किन्तु कामना समाप्त नहीं होती। कामना-पूर्ति में व्यवधान पड़ते ही क्रोध पुनः उभर आता है। काम के अन्तराल में क्रोध भी निहित है। इस शत्रु का निवास कहाँ है? इसे ढूँढ़े कहाँ? निवास जान लेने पर इसे समूल नष्ट करने में सुविधा रहेगी। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते। एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४०॥ इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोह में डालता है। तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ। पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१॥ इसलिए अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को ‘नियम्य’– संयत कर; क्योंकि

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तृतीय अध्याय ९१ शत्रु तो इनके अन्तराल में छिपा है। वह तुम्हारे शरीर के भीतर है। बाहर खोजने से वह कहीं नहीं मिलेगा। यह हृदय-देश की, अन्तर्जगत् की लड़ाई है। इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान और विज्ञान का नाश करनेवाले इस पापी काम को ही मार। काम सीधे पकड़ में नहीं आयेगा अतः विकारों के निवास-स्थान का ही घेराव कर लो, इन्द्रियों को ही संयत कर लो। किन्तु इन्द्रियों और मन को संयत करना तो बड़ा कठिन है, क्या यह हम कर पायेंगे? इस पर श्रीकृष्ण आपकी सामर्थ्य बताते हुए प्रोत्साहित करते हैं- इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः।।४२।। अर्जुन ! इस शरीर से तू इन्द्रियों को परे अर्थात् सूक्ष्म और बलवान् जान। इन्द्रियों से परे मन है, यह उनसे भी बलवान् है। मन से परे बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त परे है, वह तुम्हारी आत्मा है। वही हो तुम। इसलिये इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि का निरोध करने में तुम सक्षम हो। एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना। जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।४३।। इस प्रकार बुद्धि से परे अर्थात् सूक्ष्म और बलवान् अपने आत्मा को जानकर, आत्मबल को समझकर, बुद्धि के द्वारा अपने मन को वश में करके अर्जुन ! इस कामरूपी दुर्जय शत्रु को मार। अपनी शक्ति को समझकर इस दुर्जय शत्रु को मार। काम एक दुर्जय शत्रु है। इन्द्रियों के द्वारा यह आत्मा को मोहित करता है, तो अपनी शक्ति समझकर, आत्मा को बलवान् समझकर कामरूपी शत्रु को मार। कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह शत्रु आन्तरिक है और युद्ध भी अन्तर्देश का ही है। निष्कर्ष- बहुधा गीताप्रेमी व्याख्याताओं ने इस अध्याय को 'कर्मयोग' नाम दिया है; किन्तु यह संगत नहीं है। दूसरे अध्याय में योगेश्वर ने कर्म का नाम लिया। उन्होंने कर्म के महत्त्व का प्रतिपादन कर उसमें कर्मजिज्ञासा जागृत की और

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९२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता इस अध्याय में उन्होंने कर्म को परिभाषित किया कि यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। सिद्ध है कि यज्ञ कोई निर्धारित दिशा है। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी किया जाता है, वह इसी लोक का बन्धन है। श्रीकृष्ण जिसे कहेंगे, वह कर्म ‘मोक्ष्यसेऽशुभात्’– संसार-बन्धन से छुटकारा दिलानेवाला कर्म है। श्रीकृष्ण ने यज्ञ की उत्पत्ति को बताया। वह देता क्या है? उसकी विशेषताओं का चित्रण किया। यज्ञ करने पर बल दिया। उन्होंने कहा, इस यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। जो नहीं करते वे पापायु, आराम चाहनेवाले व्यर्थ जीते हैं। पूर्व में होनेवाले महर्षियों ने भी इसे करके ही परम नैष्कर्म्य-सिद्धि को पाया। वे आत्मतृप्त हैं, उनके लिये कर्म की आवश्यकता नहीं है, फिर भी पीछेवालों के मार्गदर्शन के लिये वे भी कर्म में भली प्रकार लगे रहते थे। उन महापुरुषों से श्रीकृष्ण ने अपनी तुलना की कि मेरा भी अब कर्म करने से कोई प्रयोजन नहीं है; किन्तु मैं भी पीछेवालों के हित के लिये ही कर्म में बरतता हूँ। श्रीकृष्ण ने स्पष्ट अपना परिचय दिया कि वे एक योगी थे। उन्होंने कर्म में प्रवृत्त साधकों को चलायमान न करने को कहा; क्योंकि कर्म करके ही उन साधकों को स्थिति प्राप्त करनी है। यदि नहीं करेंगे तो नष्ट हो जायेंगे। इस कर्म के लिये ध्यानस्थ होकर युद्ध करना है। आँखें बन्द हैं, इन्द्रियों से सिमटकर चित्त का निरोध हो चला तो युद्ध कैसा? उस समय काम-क्रोध, राग-द्वेष बाधक होते हैं। इन विजातीय प्रवृत्तियों का पार पाना ही युद्ध है। आसुरी सम्पद् कुरुक्षेत्र, विजातीय प्रवृत्ति को शनैः-शनैः छाँटते हुए ध्यानस्थ होते जाना ही युद्ध है। वस्तुतः ध्यान में ही युद्ध है। यही इस अध्याय का सारांश है, जिसमें न कर्म बताया न यज्ञ। यदि यज्ञ समझ में आ जाय तो कर्म समझ में आये। अभी तो कर्म समझाया ही नहीं गया। इस अध्याय में केवल स्थितप्रज्ञ महापुरुष के प्रशिक्षणात्मक पहलू पर बल दिया गया। यह तो गुरुजनों के लिये निर्देश है। वे न भी करें तो उन्हें कोई क्षति नहीं और न ऐसा करने में उनका अपना कोई लाभ ही है। किन्तु जिन साधकों को परमगति अभीष्ट है उनके लिये विशेष कुछ कहा ही नहीं, तो यह

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तृतीय अध्याय ९३ कर्मयोग कैसे है? कर्म का स्वरूप भी स्पष्ट नहीं है, जिसे किया जाय; क्योंकि 'यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है'- अभी तक उन्होंने इतना ही बताया। यज्ञ तो बताया नहीं, कर्म का स्वरूप स्पष्ट कहाँ हुआ? हाँ, युद्ध का यथार्थ चित्रण गीता में यहीं पाया जाता है। सम्पूर्ण गीता पर दृष्टिपात करें तो अध्याय दो में कहा कि शरीर नाशवान् है, अतः युद्ध कर। गीता में युद्ध का यही ठोस कारण बताया गया। आगे ज्ञानयोग के सन्दर्भ में क्षत्रिय के लिये युद्ध ही कल्याण का एकमात्र साधन बताया और कहा कि यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयी। कौन-सी बुद्धि? यही कि हार-जीत दोनों दृष्टियों में लाभ ही है, ऐसा समझकर युद्ध कर। फिर अध्याय चार में कहा कि योग में स्थित रहकर हृदय में स्थित अपने इस संशय को ज्ञानरूपी तलवार द्वारा काट। वह तलवार योग में है। अध्याय पाँच से दस तक युद्ध की चर्चा तक नहीं है। ग्यारहवें अध्याय में केवल इतना कहा कि ये शत्रु मेरे द्वारा पहले से ही मारे गये हैं, तू निमित्त मात्र होकर खड़ा भर हो जा। यश को प्राप्त कर। ये तुम्हारे बिना भी मारे हुए हैं, प्रेरक करा लेगा। तू इन मुर्दों को ही मार। अध्याय पन्द्रह में संसार सुविरूढ़ मूलवाला पीपल वृक्ष-जैसा कहा गया, जिसे असंगतारूपी शस्त्र द्वारा काटकर उस परमपद को खोजने का निर्देश मिला। आगे के अध्यायों में युद्ध का उल्लेख नहीं है। हाँ, अध्याय सोलह में असुरों का चित्रण अवश्य है, जो नरकगामी हैं। अध्याय तीन में ही युद्ध का विशद चित्रण है। श्लोक ३० से श्लोक ४३ तक युद्ध का स्वरूप, उसकी अनिवार्यता, युद्ध न करनेवालों का विनाश, युद्ध में मारे जानेवाले शत्रुओं के नाम, उन्हें मारने के लिये अपनी शक्ति का आह्वान और निश्चय ही उन्हें काटकर फेंकने पर बल दिया। इस अध्याय में शत्रु और शत्रु का आन्तरिक स्वरूप स्पष्ट है, जिनके विनाश की प्रेरणा दी गयी है। अतः- ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे 'शत्रुविनाशप्रेरणा' नाम तृतीयोऽध्यायः॥३॥

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९४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में ‘शत्रुविनाश-प्रेरणा’ नामक तीसरा अध्याय पूर्ण होता है। इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः ‘यथार्थगीता’ भाष्ये ‘शत्रुविनाशप्रेरणा’ नाम तृतीयोऽध्यायः।।३।। इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्द जी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के भाष्य ‘यथार्थ गीता’ में ‘शत्रुविनाश-प्रेरणा’ नामक तीसरा अध्याय पूर्ण होता है। ।। हरिः ॐ तत्सत् ।।

चतुर्थोऽध्यायः यज्ञकर्म स्पष्टीकरण

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॥ ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ ॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥ अध्याय तीन में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने आश्वस्त किया कि दोषदृष्टि से रहित होकर जो भी मानव श्रद्धायुक्त हो मेरे मत के अनुसार चलेगा, वह कर्मों के बन्धन से भली प्रकार छूट जायेगा। कर्मबन्धन से मुक्ति दिलाने की क्षमता योग (ज्ञानयोग तथा कर्मयोग, दोनों) में है। योग में ही युद्ध-संचार निहित है। प्रस्तुत अध्याय में वे बताते हैं कि इस योग का प्रणेता कौन है? इसका क्रमिक विकास कैसे होता है? श्रीभगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥१॥ अर्जुन! मैंने इस अविनाशी योग को कल्प के आदि में विवस्वान् (सूर्य) के प्रति कहा, विवस्वान् ने मनु से और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा। किसने कहा? मैंने। श्रीकृष्ण कौन थे? एक योगी। तत्त्वस्थित महापुरुष ही इस अविनाशी योग को कल्प के आरम्भ में अर्थात् भजन के आरम्भ में विवस्वान् अर्थात् जो विवश हैं, ऐसे प्राणियों से कहता है। सुरा में संचार कर देता है। यहाँ सूर्य एक प्रतीक है; क्योंकि सुरा में ही वह परम प्रकाशस्वरूप है और वहीं उसके पाने का विधान है। वास्तविक प्रकाशदाता (सूर्य) वहीं है। यह योग अविनाशी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि इसमें आरम्भ का नाश नहीं होता। इस योग का आरम्भ भर कर दें तो यह पूर्णत्व दिलाकर ही शान्त होता है। शरीर का कल्प औषधियों द्वारा होता है; किन्तु आत्मा का भजन से होता है। भजन का आरम्भ ही आत्म-कल्प का आदि है। यह साधन-भजन भी किसी महापुरुष की ही देन है। मोहनिशा में अचेत आदिम मानव, जिसमें

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९६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता भजन का कोई संस्कार नहीं है, योग के विषय में जिसने कभी सोचा तक नहीं, ऐसा मनुष्य किसी महापुरुष को देखता है तो उनके दर्शनमात्र से, उनकी वाणी से, टूटी-फूटी सेवा और सान्निध्य से योग के संस्कार उसमें संचारित हो जाते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी इसी को कहते हैं- 'जे चिताए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे।', 'ते सब भए परम पद जोगू।' (रामचरितमानस, २/२१६/१-२)। श्रीकृष्ण कहते हैं- यह योग मैंने आरम्भ में सूर्य से कहा। 'चक्षोः सूर्यो अजायत'- महापुरुष के दृष्टि-निक्षेप मात्र से योग के संस्कार सुरा में प्रसारित हो जाते हैं। स्वयंप्रकाश, स्ववश परमेश्वर का निवास सबके हृदय में है। सुरा (श्वास) के निरोध से ही उसकी प्राप्ति का विधान है। सुरा में संस्कारों का सृजन ही सूर्य के प्रति कहना है। समय आने पर यह संस्कार मन में स्फुरित होगा, यही सूर्य का मनु से कहना है। मन में स्फुरित होने पर महापुरुष के उस वाक्य के प्रति इच्छा जाग्रत हो जायेगी। यदि मन में कोई बात है तो उसे पाने की इच्छा अवश्य होगी, यही मनु का इक्ष्वाकु से कहना है। लालसा होगी कि वह नियत कर्म करें जो अविनाशी है, जो कर्म-बन्धन से मोक्ष दिलाता है-ऐसा है तो किया जाय और आराधना गति पकड़ लेती है। गति पकड़कर यह योग कहाँ पहुँचाता है? इस पर कहते हैं- एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।।२।। इस प्रकार किसी महापुरुष द्वारा संस्काररहित पुरुषों की सुरा में, सुरा से मन में, मन से इच्छा में और इच्छा तीव्र होकर क्रियात्मक आचरण में ढलकर यह योग क्रमशः उत्थान करते-करते राजर्षि श्रेणी तक पहुँच जाता है, उस अवस्था में जाकर विदित होता है। इस स्तर के साधक में ऋद्धियों-सिद्धियों का संचार होता है। यह योग इस महत्त्वपूर्णकाल में इसी लोक (शरीर) में प्रायः नष्ट हो जाता है। इस सीमा-रेखा को कैसे पार किया जाय? क्या इस विशेष स्थल पर पहुँचकर सभी नष्ट हो जाते हैं? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, जो मेरे आश्रित है, मेरा प्रिय भक्त है, अनन्य सखा है वह नष्ट नहीं होता-

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चतुर्थ अध्याय ९७ स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥३॥ वह ही यह पुरातन योग अब मैंने तेरे लिये वर्णन किया है; क्योंकि तू मेरा भक्त और सखा है और यह योग उत्तम रहस्यपूर्ण है। अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक था, राजर्षि की अवस्थावाला था, जहाँ ऋद्धियों-सिद्धियों के थपेड़े में साधक नष्ट हो जाता है। इस काल में भी योग कल्याण की मुद्रा में ही है; किन्तु प्रायः साधक यहाँ पहुँचकर लड़खड़ा जाते हैं। ऐसा अविनाशी किन्तु रहस्यमय योग श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, क्योंकि नष्ट होने की अवस्था में अर्जुन था ही। क्यों कहा? इसलिये कि तू मेरा भक्त है, अनन्य भाव से मेरे आश्रित है, प्रिय है, सखा है। जिस परमात्मा की हमें चाह है, वह (सद्गुरु) परमात्मा आत्मा से अभिन्न होकर जब निर्देशन देने लगे, तभी वास्तविक भजन आरम्भ होता है। यहाँ प्रेरक की अवस्था में परमात्मा और सद्गुरु एक दूसरे के पर्याय हैं। जिस सतह पर हम खड़े हैं उसी स्तर पर जब स्वयं प्रभु हृदय में उतर आयें, रोकथाम करने लगें, डगमगाने पर सँभालें, तभी मन वश में हो पाता है- ‘तुलसिदास ( मन ) बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजै।’ ( विनयपत्रिका, ८९ ) जब तक इष्टदेव रथी होकर, आत्मा से अभिन्न होकर प्रेरक के रूप में खड़े नहीं हो जाते, तब तक सही मात्रा में प्रवेश ही नहीं होता। वह साधक प्रत्याशी अवश्य है, लेकिन भजन उसके पास कहाँ? पूज्य गुरुदेव भगवान कहा करते थे- “हो ! हम कई बार नष्ट होते-होते बच गये। भगवान ने ही बचा लिया। भगवान ने ऐसे समझाया, यह कहा।” हमने पूछा- “महाराज जी ! क्या भगवान भी बोलते हैं, बातचीत करते हैं? वे बोले- “हाँ हो ! भगवान ऐसे बतियावत हैं जैसे हम-तुम बतियाईं, घण्टों बतियाईं और क्रम न टूटे।” हमें उदासी हुई और आश्चर्य भी कि भगवान कैसे बोलते होंगे, यह तो बड़ी नयी बात है। कुछ देर बाद महाराज जी बोले- “काहे घबड़ात है! तोहूँ से बतियैहैं।” अक्षरशः सत्य था उनका कथन और यही सख्यभाव है। सखा की तरह वे निराकरण करते रहें, तभी इस नष्ट होनेवाली स्थिति से साधक पार हो पाता है।

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९८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता अभी तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने किसी महापुरुष द्वारा योग का आरम्भ, उसमें आनेवाले व्यवधान और उनसे पार पाने का रास्ता बताया। इस पर अर्जुन ने प्रश्न किया- अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४॥ भगवन्! आपका जन्म तो ‘अपरम्’- अब हुआ है और मेरे अन्दर सुरा का संचार बहुत पुराना है, तो मैं कैसे मान लूँ कि इस योग को भजन के आदि में आपने ही कहा था? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले- श्रीभगवानुवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥५॥ अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। हे परंतप! उन सबको तू नहीं जानता; किन्तु मैं जानता हूँ। साधक नहीं जानता, स्वरूपस्थ महापुरुष जानता है, अव्यक्त की स्थितिवाला जानता है। क्या आप सबकी तरह पैदा होते हैं? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, स्वरूप की प्राप्ति शरीर-प्राप्ति से भिन्न है। मेरा जन्म इन आँखों से नहीं देखा जा सकता। मैं अजन्मा, अव्यक्त, शाश्वत होते हुए भी शरीर के आधारवाला हूँ। अवधू जीवत में कर आसा। मुए मुक्ति गुरु कहे स्वार्थी, झूठा दे विश्वासा।। शरीर के रहते ही उस परमतत्त्व में प्रवेश पाया जाता है। लेशमात्र भी कमी है, जन्म लेना पड़ता है। अभी तक अर्जुन श्रीकृष्ण को अपने समान देहधारी समझता है। वह अन्तरंग प्रश्न रखता है- क्या आपका जन्म वैसा ही है, जैसा सबका है? क्या आप भी शरीरों की तरह पैदा होते हैं? श्रीकृष्ण कहते हैं- अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥६॥

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चतुर्थ अध्याय ९९ मैं विनाशरहित, पुनः जन्मरहित और समस्त प्राणियों के स्वर में संचारित होने पर भी अपनी प्रकृति को अधीन करके आत्ममाया से प्रकट होता हूँ। एक माया तो अविद्या है जो प्रकृति में ही विश्वास दिलाती है, नीच एवं अधम योनियों का कारण बनती है। दूसरी माया है आत्ममाया, जो आत्मा में प्रवेश दिलाती है, स्वरूप के जन्म का कारण बनती है। इसी को योगमाया भी कहते हैं। जिससे हम विलग हैं उस शाश्वत स्वरूप से यह जोड़ती है, मिलन कराती है। उस आत्मिक प्रक्रिया द्वारा मैं अपनी त्रिगुणमयी प्रकृति को अधीन करके ही प्रकट होता हूँ। प्रायः लोग कहते हैं कि भगवान का अवतार होगा तो दर्शन कर लेंगे। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं होता कि कोई दूसरा देख सके। स्वरूप का जन्म पिण्डरूप में नहीं होता। श्रीकृष्ण कहते हैं- योग-साधना द्वारा, आत्ममाया द्वारा अपनी त्रिगुणमयी प्रकृति को स्ववश करके मैं क्रमशः प्रकट होता हूँ। लेकिन किन परिस्थितियों में?- यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।७।। हे अर्जुन! जब-जब परमधर्म परमात्मा के लिये हृदय ग्लानि से भर जाता है, जब अधर्म की वृद्धि से भाविक पार पाते नहीं देखता, तब मैं आत्मा को रचने लगता हूँ। ऐसी ही ग्लानि मनु को हुई थी- हृदयँ बहुत दुख लाग, जनम गयउ हरिभगति बिनु।। ( रामचरितमानस, १/१४२ ) जब आपका हृदय अनुराग से पूरित हो जाय, उस शाश्वत-धर्म के लिये 'गदगद गिरा नयन बह नीरा।' ( रामचरितमानस, ३/१५/११ ) की स्थिति आ जाय, जब प्रयत्न करके भी अनुरागी अधर्म का पार नहीं पाता- ऐसी परिस्थिति में मैं अपने स्वरूप को रचता हूँ। अर्थात् भगवान का आविर्भाव केवल अनुरागी के लिये है- 'सो केवल भगतन हित लागी।' ( रामचरितमानस, १/१२/५ )

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१०० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता यह अवतार किसी भाग्यवान् साधक के अन्तराल में होता है। आप प्रकट होकर करते क्या हैं?- परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥८॥ अर्जुन ! 'साधूनां परित्राणाय' - परमसाध्य एकमात्र परमात्मा है, जिसे साध लेने पर कुछ भी साधना शेष नहीं रह जाता। उस साध्य में प्रवेश दिलानेवाले विवेक, वैराग्य, शम, दम इत्यादि दैवी सम्पद् को निर्विघ्न प्रवाहित करने के लिये तथा 'दुष्कृताम्' - जिनसे दूषित कार्यरूप लेते हैं उन काम, क्रोध, राग, द्वेषादि विजातीय प्रवृत्तियों को समूल नष्ट करने के लिये तथा धर्म को भली प्रकार स्थिर करने के लिये मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ। युग का तात्पर्य सत्ययुग, त्रेता या द्वापर नहीं, युगधर्मों का उतार-चढ़ाव मनुष्यों के स्वभाव पर है। युगधर्म सदैव रहते हैं। मानस में संकेत है- नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे।। ( रामचरितमानस, ७/१०३ ख/१ ) युगधर्म सभी के हृदय में नित्य होते रहते हैं। अविद्या से नहीं बल्कि विद्या से, राममाया की प्रेरणा से हृदय में होते हैं। जिसे प्रस्तुत श्लोक में आत्ममाया कहा गया है, वही है राममाया। हृदय में राम की स्थिति दिला देनेवाली राम से प्रेरित है वह विद्या। कैसे समझा जाय कि अब कौन-सा युग कार्य कर रहा है, तो 'सुद्ध सत्व समता बिज्ञाना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।।' ( रामचरितमानस, ७/१०३ख/२ ) जब हृदय में शुद्ध सत्त्वगुण ही कार्यरत हो, राजस तथा तामस दोनों गुण शान्त हो जायें, विषमताएँ समाप्त हो गयी हों, जिसका किसी से द्वेष न हो, विज्ञान हो अर्थात् इष्ट से निर्देशन लेने और उस पर टिकने की क्षमता हो, मन में प्रसन्नता का पूर्ण संचार हो- जब ऐसी योग्यता आ जाय तो सत्ययुग में प्रवेश मिल गया। इसी प्रकार दो अन्य युगों का वर्णन किया और अन्त में- तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।। ( रामचरितमानस, ७/१०३ ख/५ )

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चतुर्थ अध्याय १०१ तामसी गुण भरपूर हो, किंचित् राजसी गुण भी उसमें हो, चारों ओर वैर और विरोध हो तो ऐसा व्यक्ति कलियुगीन है। जब तामसी गुण कार्य करता है तो मनुष्य में आलस्य, निद्रा, प्रमाद का बाहुल्य होता है। वह कर्त्तव्य जानते हुए भी उसमें प्रवृत्त नहीं हो सकता, निषिद्ध कर्म जानते हुए भी उससे निवृत्त नहीं हो सकता। इस प्रकार युगधर्मों का उतार-चढ़ाव मनुष्यों की आन्तरिक योग्यता पर निर्भर है। किसी ने इन्हीं योग्यताओं को चार युग कहा है, तो कोई इन्हें ही चार वर्ण का नाम देता है, तो कोई इन्हें ही अति उत्तम, उत्तम, मध्यम और निकृष्ट चार श्रेणी के साधक कहकर सम्बोधित करता है। प्रत्येक युग में इष्ट साथ देते हैं। हाँ, उच्चश्रेणी में अनुकूलता की भरपूरता प्रतीत होती है, निम्न युगों में सहयोग क्षीण प्रतीत होता है। संक्षेप में, श्रीकृष्ण कहते हैं- साध्य वस्तु दिलानेवाले विवेक, वैराग्य इत्यादि को निर्विघ्न प्रवाहित करने के लिये तथा दूषण के कारक काम-क्रोध, राग-द्वेष इत्यादि का पूर्ण विनाश करने के लिये, परमधर्म परमात्मा में स्थिर रखने के लिये मैं युग-युग में अर्थात् हर परिस्थिति, हर श्रेणी में प्रकट होता हूँ- बशर्ते कि ग्लानि हो। जब तक इष्ट समर्थन न दें, तब तक आप समझ ही नहीं सकेंगे कि विकारों का विनाश हुआ अथवा अभी कितना शेष है? प्रवेश से पराकाष्ठापर्यन्त इष्ट हर श्रेणी में हर योग्यता के साथ रहते हैं। उनका प्राकट्य अनुरागी के हृदय में होता है। भगवान प्रकट होते हैं, तब तो सभी दर्शन करते होंगे? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥९॥ अर्जुन! मेरा वह जन्म अर्थात् ग्लानि के साथ स्वरूप की रचना तथा मेरा कर्म अर्थात् दुष्कृतियों के कारणों का विनाश, साध्य वस्तु को दिलानेवाली क्षमताओं का निर्दोष संचार, धर्म की स्थिरता, यह कर्म और जन्म दिव्य अर्थात् अलौकिक है, लौकिक नहीं है। इन चर्मचक्षुओं से उसे देखा नहीं जा सकता, मन और बुद्धि से उसे मापा नहीं जा सकता। जब इतना गूढ़ है तो उसे देखता कौन है? केवल 'यो वेत्ति तत्त्वतः' - तत्त्वदर्शी ही मेरे इस जन्म और

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१०२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता कर्म को देखता है और मेरा साक्षात् करके वह पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होता, बल्कि मुझे प्राप्त होता है। जब तत्त्वदर्शी ही भगवान का जन्म और कार्य देख पाता है तो लोग लाखों की संख्या में भीड़ लगाये क्यों खड़े हैं कि कहीं अवतार होगा तो दर्शन करेंगे? क्या आप तत्त्वदर्शी हैं? महात्मा-वेष में आज भी विविध तरीकों से, मुख्यतः महात्मा-वेष की आड़ में बहुत से लोग प्रचार करते फिरते हैं कि वे अवतार हैं या उनके दलाल प्रचार कर देते हैं। लोग भेड़ की तरह अवतार को देखने टूट पड़ते हैं; किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं कि केवल तत्त्वदर्शी ही देख पाता है। अब तत्त्वदर्शी किसे कहते हैं? अध्याय २ में सत्-असत् का निर्णय देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया- अर्जुन ! असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत् का तीनों कालों में कभी अभाव नहीं है। तो क्या आप ऐसा कहते हैं? उन्होंने बताया- “नहीं, तत्त्वदर्शियों ने इसे देखा।” न किसी भाषाविद् ने देखा, न किसी समृद्धिशाली ने देखा। यहाँ पुनः बल देते हैं कि मेरा आविर्भाव तो होता है लेकिन उसे तत्त्वदर्शी ही देख पाता है। तत्त्वदर्शी एक प्रश्न है। ऐसा कुछ नहीं कि पाँच तत्त्व हैं, पचीस तत्त्व हैं- इनकी गणना सीख ली और हो गये तत्त्वदर्शी। श्रीकृष्ण ने आगे बताया कि आत्मा ही परमतत्त्व है। आत्मा परम से संयुक्त होकर परमात्मा हो जाता है। आत्मसाक्षात्कार करनेवाला ही इस आविर्भाव को समझ पाता है। सिद्ध है कि अवतार किसी विरही अनुरागी के हृदय में होता है। आरम्भ में उसे वह समझ नहीं पाता कि हमें कौन संकेत देता है? कौन मार्गदर्शन करता है? किन्तु परमतत्त्व परमात्मा के दर्शन के साथ ही वह देख पाता है, समझ पाता है और फिर शरीर को त्यागकर पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता। श्रीकृष्ण ने कहा कि मेरा जन्म दिव्य है, इसे देखनेवाला मुझे प्राप्त होता है, तो लोगों ने उनकी मूर्ति बना ली, पूजा करने लगे। आकाश में कहीं उनके निवास की कल्पना कर ली। ऐसा कुछ नहीं है। उन महापुरुष का आशय केवल इतना है कि यदि आप निर्धारित कर्म करें तो पायेंगे कि आप भी दिव्य

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चतुर्थ अध्याय १०३ हैं। आप जो हो सकते हैं, वह मैं हो गया हूँ। मैं आपकी सम्भावना हूँ, आपका ही भविष्य हूँ। अपने भीतर आप जिस दिन ऐसी पूर्णता पा लेंगे तो आप भी वही होंगे जो श्रीकृष्ण हैं। जो श्रीकृष्ण का स्वरूप है, वही आपका भी हो सकता है। अवतार कहीं बाहर नहीं होता। हाँ, यदि अनुरागपूरित हृदय हो तो आपके भीतर भी अवतार की अनुभूति सम्भव है। वे आपको प्रोत्साहित करते हैं कि बहुत से लोग इस मार्ग पर चलकर मेरे स्वरूप को प्राप्त कर चुके हैं- वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥१०॥ राग और विराग, दोनों से परे वीतराग तथा इसी प्रकार भय-अभय, क्रोध-अक्रोध दोनों से परे, अनन्य भाव से अर्थात् अहंकाररहित मेरी शरण हुए बहुत से लोग ज्ञान-तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं। अब ऐसा होने लगा हो- ऐसी बात नहीं है, यह विधान सदैव रहा है। बहुत से पुरुष इसी प्रकार से मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं। किस प्रकार? जिन-जिन का हृदय अधर्म की वृद्धि देखकर परमात्मा के लिये ग्लानि से भर गया, उस स्थिति में मैं अपने स्वरूप को रचता हूँ। वे मेरे स्वरूप को प्राप्त होते हैं। जिसे योगेश्वर श्रीकृष्ण ने तत्त्वदर्शन कहा, उसे ही अब 'ज्ञान' कहते हैं। परमतत्त्व है परमात्मा, उसे प्रत्यक्ष दर्शन के साथ जानना ज्ञान है। ऐसी जानकारीवाले ज्ञानी मेरे स्वरूप को प्राप्त करते हैं। यहाँ यह प्रश्न पूरा हो गया। अब वे योग्यता के आधार पर भजनेवालों का श्रेणी-विभाजन करते हैं- ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥११॥ पार्थ! जो मुझे जितनी लगन से जैसा भजते हैं, मैं भी उनको वैसा ही भजता हूँ। उतनी ही मात्रा में सहयोग देता हूँ। साधक की श्रद्धा ही कृपा बनकर उसे मिलती है। इस रहस्य को जानकर सुधीजन सम्पूर्ण भावों से मेरे मार्ग के अनुसार ही बरतते हैं। जैसा मैं बरतता हूँ, जो मुझे प्रिय है वैसा ही आचरण करते हैं। जो मैं कराना चाहता हूँ, वही करते हैं।

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१०४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता भगवान् कैसे भजते हैं? वे रथी बनकर खड़े हो जाते हैं, साथ चलने लगते हैं, यही उनका भजना है। दूषित जिनसे पैदा होते हैं, उनका विनाश करने के लिये वे खड़े हो जाते हैं। सत्य में प्रवेश दिलानेवाले सद्गुणों का परित्राण करने के लिये वे खड़े हो जाते हैं। जब तक इष्टदेव हृदय से पूर्णतः रथी न हों और हर कदम पर सावधान न करें, तब तक कोई कैसा ही भजनानन्दी क्यों न हो, लाख आँख मूँदे, लाख प्रयत्न करे, वह इस प्रकृति के द्वन्द्व से पार नहीं हो सकता। वह कैसे समझेगा कि वह कितनी दूरी तय कर चुका, कितनी शेष है। इष्ट ही आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जाते हैं और उसका मार्गदर्शन करते हैं कि तुम यहाँ पर हो, ऐसे करो, ऐसे चलो। इस प्रकार प्रकृति की खाईं पाटते हुए, शनैः-शनैः आगे बढ़ाते हुए स्वरूप में प्रवेश दिला देंगे। भजन तो साधक को ही करना पड़ता है; किन्तु उसके द्वारा इस पथ में जो दूरी तय होती है, वह इष्ट की देन है। ऐसा जानकर सभी मनुष्य सर्वतोभावेन मेरा अनुसरण करते हैं। किस प्रकार वे बरतते हैं?- काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।।१२।। वे पुरुष इस शरीर में कर्मों की सिद्धि चाहते हुए देवताओं को पूजते हैं। कौन-सा कर्म? श्रीकृष्ण ने कहा, “अर्जुन! तू नियत कर्म कर।” नियत कर्म क्या है? यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। यज्ञ क्या है? साधना की विधि-विशेष, जिसमें श्वास-प्रश्वास का हवन, इन्द्रियों के बहिर्मुखी प्रवाह को संयमाग्नि में हवन किया जाता है, जिसका परिणाम है परमात्मा। कर्म का शुद्ध अर्थ है आराधना, जिसका स्वरूप इसी अध्याय में आगे मिलेगा। इस आराधना का परिणाम क्या है? ‘संसिद्धिम्’- परमसिद्धि परमात्मा, ‘यान्ति ब्रह्म सनातनम्’- शाश्वत ब्रह्म में प्रवेश, परम नैष्कर्म्य की स्थिति। श्रीकृष्ण कहते हैं- मेरे अनुसार बरतनेवाले लोग इस मनुष्य-लोक में कर्म के परिणाम परम नैष्कर्म्य- सिद्धि के लिये देवताओं को पूजते हैं अर्थात् दैवी सम्पद् को बलवती बनाते हैं। तीसरे अध्याय में उन्होंने बताया कि इस यज्ञ द्वारा तुम देवताओं की वृद्धि करो, दैवी सम्पद् को बलवती बनाओ। ज्यों-ज्यों हृदय-देश में दैवी

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चतुर्थ अध्याय १०५ सम्पद् की उन्नति होगी, त्यों-त्यों तुम्हारी उन्नति होगी। इस प्रकार परस्पर उन्नति करते हुए परमश्रेय को प्राप्त हो जाओ। अन्त तक उन्नति करते जाने की यह अन्तःक्रिया है। इसी पर बल देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं- मेरे अनुकूल बरतनेवाले लोग इस मनुष्य-शरीर में कर्मों की सिद्धि चाहते हुए दैवी सम्पद् को बलवती बनाते हैं, जिससे वह नैष्कर्म्य-सिद्धि शीघ्र होती है। वह असफल नहीं होती, सफल ही होती है। शीघ्र का तात्पर्य? क्या कर्म में प्रवृत्त होते ही तत्क्षण यह परमसिद्धि मिल जाती है? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, इस सोपान पर क्रमशः चढ़ने का विधान है। कोई छलांग लगाकर भावातीत ध्यान-जैसा चमत्कार नहीं होता। इस पर देखें- चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ।।१३।। अर्जुन ! 'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्'- चार वर्णों की रचना मैंने की। तो क्या मनुष्यों को चार भागों में बाँट दिया? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, 'गुणकर्म- विभागशः'-गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बाँटा। गुण एक पैमाना है, मापदण्ड है। तामसी गुण होगा तो आलस्य, निद्रा, प्रमाद, कर्म में न प्रवृत्त होने का स्वभाव, जानते हुए भी अकर्त्तव्य से निवृत्ति न हो पाने की विवशता रहेगी। ऐसी अवस्था में साधन आरम्भ कैसे करें? दो घण्टे आप आराधना में बैठते हैं, इस कर्म के लिये प्रयत्नशील होना चाहते हैं किन्तु दस मिनट भी अपने पक्ष में नहीं पाते। शरीर अवश्य बैठा है, लेकिन जिस मन को बैठना चाहिये वह हवा से बातें कर रहा है, कुतर्कों का जाल बुन रहा है, तरंग पर तरंग छायी है, तो आप बैठे क्यों हैं? समय क्यों नष्ट करते हैं? उस समय केवल 'परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।' (१८/४४)- जो महापुरुष अव्यक्त की स्थितिवाले हैं, अविनाशी तत्त्व में स्थित हैं उनकी तथा इस पथ पर अग्रसर अपने से उन्नत लोगों की सेवा में लग जाओ। इससे दूषित संस्कार शमन होते जायेंगे, साधना में प्रवेश दिलानेवाले संस्कार सबल होते जायेंगे। क्रमशः तामसी गुण न्यून होने पर राजसी गुणों की प्रधानता तथा सात्त्विक गुण के स्वल्प संचार के साथ साधक की क्षमता वैश्य श्रेणी की हो

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१०६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता जाती है। उस समय वही साधक इन्द्रिय-संयम, आत्मिक सम्पत्ति का संग्रह स्वभावतः करने लगेगा। कर्म करते-करते उसी साधक में सात्त्विक गुणों का बाहुल्य हो जायेगा, राजसी गुण कम रह जायेंगे, तामसी गुण शान्त रहेंगे। उस समय वही साधक क्षत्रिय श्रेणी में प्रवेश पा लेगा। शौर्य, कर्म में प्रवृत्त रहने की क्षमता, पीछे न हटने का स्वभाव, सब भावों पर स्वामिभाव, प्रकृति के तीनों गुणों को काटने की क्षमता उसके स्वभाव में ढल जायेगी। वही कर्म और सूक्ष्म होने पर, मात्र सात्त्विक गुण कार्यरत रह जाने पर मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, एकाग्रता, सरलता, ध्यान, समाधि, ईश्वरीय निर्देश, आस्तिकता इत्यादि ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली स्वाभाविक क्षमता के साथ वही साधक ब्राह्मण श्रेणी का कहा जाता है। यह ब्राह्मण श्रेणी के कर्म की निम्नतम सीमा है। जब वही साधक ब्रह्म में स्थित हो जाता है, उस अन्तिम सीमा में वह स्वयं में न ब्राह्मण रहता है न क्षत्रिय, न वैश्य न शूद्र; किन्तु दूसरों के मार्गदर्शनहेतु वही ब्राह्मण है। कर्म एक ही है- नियत कर्म, आराधना। अवस्था-भेद से इसी कर्म को ऊँची-नीची चार सीढ़ियों में बाँटा। किसने बाँटा? किसी योगेश्वर ने बाँटा, अव्यक्त स्थितिवाले महापुरुष ने बाँटा। उसके कर्त्ता मुझ अविनाशी को अकर्त्ता ही जान। क्यों?- न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ।।१४।। क्योंकि कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है। कर्मों का फल क्या है? श्रीकृष्ण ने पीछे बताया कि यज्ञ जिससे पूरा होता है, उस क्रिया का नाम कर्म है और पूर्तिकाल में यज्ञ जिसकी रचना करता है, उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला शाश्वत, सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा लेता है। कर्म का परिणाम है परमात्मा, उस परमात्मा की चाह भी अब मुझे नहीं है; क्योंकि वह मुझसे भिन्न नहीं है। मैं अव्यक्त स्वरूप हूँ, उसी की स्थितिवाला हूँ। अब आगे कोई सत्ता नहीं, जिसके लिये इस कार्य पर स्नेह रखूँ। इसलिये कर्म मुझे लिपायमान नहीं करते और इसी स्तर से जो भी मुझे जानता है अर्थात् जो कर्मों के परिणाम ‘परमात्मा’ को प्राप्त कर लेता है, उसे भी कर्म नहीं बाँधते। जैसे श्रीकृष्ण, वैसे उस स्तर से जाननेवाले महापुरुष।

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चतुर्थ अध्याय १०७ एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥१५॥ अर्जुन! पहले होनेवाले मोक्ष की इच्छावाले पुरुषों द्वारा भी यही जानकर कर्म किया गया। क्या जानकर? यही कि जब कर्मों का परिणाम परमात्मा भिन्न न रह जाय, कर्मों के परिणाम परमात्मा की स्पृहा न रह जाने पर उस पुरुष को कर्म नहीं बाँधते। श्रीकृष्ण इसी स्थितिवाले हैं इसलिये वे कर्म में लिपायमान नहीं होते और उसी स्तर से हम जान लेंगे तो हमें भी कर्म नहीं बाँधेगा। जैसे श्रीकृष्ण, ठीक उसी स्तर से जो भी जान लेगा, वैसा ही वह पुरुष भी कर्मबन्धन से मुक्त हो जायेगा। अब श्रीकृष्ण 'भगवान', 'महात्मा', 'अव्यक्त', 'योगेश्वर' या 'महायोगेश्वर' जो भी रहे हों, वह स्वरूप सबके लिये है। यही समझकर पहले के मुमुक्षु पुरुषों ने, मोक्ष की इच्छावाले पुरुषों ने कर्म पर कदम रखा। इसलिये अर्जुन! तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किये हुए इसी कर्म को कर। यही कल्याण का एकमात्र मार्ग है। अभी तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कर्म करने पर बल दिया; किन्तु यह स्पष्ट नहीं किया कि कर्म क्या है? अध्याय दो में उन्होंने कर्म का नाम मात्र लिया कि अब इसी को तू निष्काम कर्म के विषय में सुन। उसकी विशेषताओं का वर्णन किया कि यह जन्म-मरण के महान् भय से रक्षा करता है। कर्म करते समय सावधानी का वर्णन किया, लेकिन यह नहीं बताया कि कर्म क्या है? अध्याय तीन में उन्होंने कहा कि ज्ञानमार्ग अच्छा लगे या निष्काम कर्मयोग, कर्म तो करना ही पड़ेगा। न तो कर्मों को त्यागने से कोई ज्ञानी होता है और न तो कर्मों को न आरम्भ करने से कोई निष्कर्मी। हठवश जो नहीं करते, वे दम्भी हैं। इसलिये मन से इन्द्रियों को वश में करके कर्म कर। कौन-सा कर्म करे? तो बताया- नियत कर्म कर। अब यह निर्धारित कर्म है क्या? तो बोले- यज्ञ की प्रक्रिया ही नियत कर्म है। एक नवीन प्रश्न दिया कि यज्ञ क्या है, जिसे करें तो कर्म हो जाय? वहाँ भी यज्ञ की उत्पत्ति को बताया, उसकी विशेषताओं का वर्णन किया; किन्तु यज्ञ नहीं बताया, जिससे कर्म को समझा जा सके। अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ कि कर्म क्या है? अब कहते हैं- अर्जुन! कर्म क्या है,

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१०८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता अकर्म क्या है? इस विषय में बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हैं, उसे भली प्रकार समझ लेना चाहिये। किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१६।। कर्म क्या है और अकर्म क्या है?- इस विषय में बुद्धिमान् पुरुष भी मोहित हैं। इसलिये मैं वह कर्म तेरे लिये अच्छी तरह से कहूँगा, जिसे जानकर तू ‘अशुभात् मोक्ष्यसे’- अशुभ अर्थात् संसार-बन्धन से भली प्रकार छूट जायेगा। कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जो संसार-बन्धन से मुक्ति दिलाती है। इसी कर्म को जानने के लिये श्रीकृष्ण पुनः बल देते हैं- कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।१७।। कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये, अकर्म का स्वरूप भी समझना चाहिये और विकर्म अर्थात् विकल्पशून्य विशेष कर्म जो आप्तपुरुषों द्वारा होता है, उसे भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्म की गति गहन है। कतिपय लोगों ने विकर्म का अर्थ ‘निषिद्ध कर्म’, ‘मन लगाकर किया गया कर्म’ इत्यादि किया है। वस्तुतः यहाँ ‘वि’ उपसर्ग विशिष्टता का द्योतक है। प्राप्ति के पश्चात् महापुरुषों के कर्म विकल्पशून्य होते हैं। आत्मस्थित, आत्मतृप्त, आप्तकाम महापुरुषों को न तो कर्म करने से कोई लाभ है और न छोड़ने से कोई हानि ही है, फिर भी वे पीछेवालों के हित के लिये कर्म करते हैं। ऐसा कर्म विकल्पशून्य है, विशुद्ध है और यही कर्म विकर्म कहलाता है। उदाहरणार्थ गीता में जहाँ भी किसी कार्य में ‘वि’ उपसर्ग लगा है, उसकी विशेषता का द्योतक है, निकृष्टता का नहीं। यथा ‘योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।’ (गीता ५/७)- जो योग से युक्त है वह विशेष रूप से शुद्ध आत्मावाला, विशेष रूप से जीते अन्तःकरणवाला इत्यादि विशेषता के ही द्योतक हैं। इसी प्रकार गीता में स्थान-स्थान पर ‘वि’ का प्रयोग हुआ है, जो विशेष पूर्णता का द्योतक है। इसी प्रकार ‘विकर्म’ भी विशिष्ट कर्म का

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चतुर्थ अध्याय १०९ द्योतक है जो प्राप्ति के पश्चात् महापुरुषों के द्वारा सम्पादित होता है, जो शुभाशुभ संस्कार नहीं डालता। अभी आपने विकर्म देखा। रहा कर्म और अकर्म, जिसे अगले श्लोक में समझने का प्रयास करें। यदि यहाँ कर्म और अकर्म का विभाजन नहीं समझ सके तो कभी नहीं समझ सकेंगे- कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्।।१८।। जो पुरुष कर्म में अकर्म देखे, कर्म माने आराधना अर्थात् आराधना करे और यह भी समझे कि करनेवाला मैं नहीं हूँ बल्कि गुणों की अवस्था ही चिन्तन में हमें नियुक्त करती है, 'मैं इष्ट द्वारा संचालित हूँ'- ऐसा देखे और जब इस प्रकार अकर्म देखने की क्षमता आ जाय और धारावाहिक रूप से कर्म होता रहे, तभी समझना चाहिये कि कर्म सही दिशा में हो रहा है। वही पुरुष मनुष्यों में बुद्धिमान् है, मनुष्यों में योगी है, योग से युक्त बुद्धिवाला है और सम्पूर्ण कर्मों को करनेवाला है। उसके द्वारा कर्म करने में लेशमात्र भी त्रुटि नहीं रह जाती। सारांशतः आराधना ही कर्म है, उस कर्म को करें और करते हुए अकर्म देखें कि मैं तो यन्त्रमात्र हूँ, करानेवाला इष्ट है और मैं गुणों से उत्पन्न अवस्था के अनुसार ही चेष्टा कर पाता हूँ। जब अकर्म की यह क्षमता आ जाय और धारावाहिक कर्म होता रहे, तभी परमकल्याण की स्थिति दिलानेवाला कर्म हो पाता है। 'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे कि, "जब तक इष्ट रथी न हो जाय, रोकथाम न करने लगे, तब तक सही मात्रा में साधना का आरम्भ ही नहीं होता।" इसके पूर्व जो कुछ भी किया जाता है, कर्म में प्रवेश के प्रयास से अधिक कुछ भी नहीं है। हल का सारा भार बैलों के कन्धों पर ही रहता है, फिर भी खेत की जुताई हलवाहे की देन है। ठीक इसी प्रकार साधन का सारा भार साधक के ऊपर ही रहता है; किन्तु वास्तविक साधक तो इष्ट है जो उसके पीछे लगा हुआ है, जो उसका मार्गदर्शन करता है। जब तक इष्ट निर्णय न दें, तब तक आप समझ ही नहीं सकेंगे कि हमसे हुआ क्या? हम प्रकृति में भटक रहे हैं या परमात्मा में? इस प्रकार इष्ट के निर्देशन में जो साधक इस आत्मिक