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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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१०६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता जाती है। उस समय वही साधक इन्द्रिय-संयम, आत्मिक सम्पत्ति का संग्रह स्वभावतः करने लगेगा। कर्म करते-करते उसी साधक में सात्त्विक गुणों का बाहुल्य हो जायेगा, राजसी गुण कम रह जायेंगे, तामसी गुण शान्त रहेंगे। उस समय वही साधक क्षत्रिय श्रेणी में प्रवेश पा लेगा। शौर्य, कर्म में प्रवृत्त रहने की क्षमता, पीछे न हटने का स्वभाव, सब भावों पर स्वामिभाव, प्रकृति के तीनों गुणों को काटने की क्षमता उसके स्वभाव में ढल जायेगी। वही कर्म और सूक्ष्म होने पर, मात्र सात्त्विक गुण कार्यरत रह जाने पर मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, एकाग्रता, सरलता, ध्यान, समाधि, ईश्वरीय निर्देश, आस्तिकता इत्यादि ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली स्वाभाविक क्षमता के साथ वही साधक ब्राह्मण श्रेणी का कहा जाता है। यह ब्राह्मण श्रेणी के कर्म की निम्नतम सीमा है। जब वही साधक ब्रह्म में स्थित हो जाता है, उस अन्तिम सीमा में वह स्वयं में न ब्राह्मण रहता है न क्षत्रिय, न वैश्य न शूद्र; किन्तु दूसरों के मार्गदर्शनहेतु वही ब्राह्मण है। कर्म एक ही है- नियत कर्म, आराधना। अवस्था-भेद से इसी कर्म को ऊँची-नीची चार सीढ़ियों में बाँटा। किसने बाँटा? किसी योगेश्वर ने बाँटा, अव्यक्त स्थितिवाले महापुरुष ने बाँटा। उसके कर्त्ता मुझ अविनाशी को अकर्त्ता ही जान। क्यों?- न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ।।१४।। क्योंकि कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है। कर्मों का फल क्या है? श्रीकृष्ण ने पीछे बताया कि यज्ञ जिससे पूरा होता है, उस क्रिया का नाम कर्म है और पूर्तिकाल में यज्ञ जिसकी रचना करता है, उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला शाश्वत, सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा लेता है। कर्म का परिणाम है परमात्मा, उस परमात्मा की चाह भी अब मुझे नहीं है; क्योंकि वह मुझसे भिन्न नहीं है। मैं अव्यक्त स्वरूप हूँ, उसी की स्थितिवाला हूँ। अब आगे कोई सत्ता नहीं, जिसके लिये इस कार्य पर स्नेह रखूँ। इसलिये कर्म मुझे लिपायमान नहीं करते और इसी स्तर से जो भी मुझे जानता है अर्थात् जो कर्मों के परिणाम ‘परमात्मा’ को प्राप्त कर लेता है, उसे भी कर्म नहीं बाँधते। जैसे श्रीकृष्ण, वैसे उस स्तर से जाननेवाले महापुरुष।

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