यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextचतुर्थ अध्याय १०५ सम्पद् की उन्नति होगी, त्यों-त्यों तुम्हारी उन्नति होगी। इस प्रकार परस्पर उन्नति करते हुए परमश्रेय को प्राप्त हो जाओ। अन्त तक उन्नति करते जाने की यह अन्तःक्रिया है। इसी पर बल देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं- मेरे अनुकूल बरतनेवाले लोग इस मनुष्य-शरीर में कर्मों की सिद्धि चाहते हुए दैवी सम्पद् को बलवती बनाते हैं, जिससे वह नैष्कर्म्य-सिद्धि शीघ्र होती है। वह असफल नहीं होती, सफल ही होती है। शीघ्र का तात्पर्य? क्या कर्म में प्रवृत्त होते ही तत्क्षण यह परमसिद्धि मिल जाती है? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, इस सोपान पर क्रमशः चढ़ने का विधान है। कोई छलांग लगाकर भावातीत ध्यान-जैसा चमत्कार नहीं होता। इस पर देखें- चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ।।१३।। अर्जुन ! 'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्'- चार वर्णों की रचना मैंने की। तो क्या मनुष्यों को चार भागों में बाँट दिया? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, 'गुणकर्म- विभागशः'-गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बाँटा। गुण एक पैमाना है, मापदण्ड है। तामसी गुण होगा तो आलस्य, निद्रा, प्रमाद, कर्म में न प्रवृत्त होने का स्वभाव, जानते हुए भी अकर्त्तव्य से निवृत्ति न हो पाने की विवशता रहेगी। ऐसी अवस्था में साधन आरम्भ कैसे करें? दो घण्टे आप आराधना में बैठते हैं, इस कर्म के लिये प्रयत्नशील होना चाहते हैं किन्तु दस मिनट भी अपने पक्ष में नहीं पाते। शरीर अवश्य बैठा है, लेकिन जिस मन को बैठना चाहिये वह हवा से बातें कर रहा है, कुतर्कों का जाल बुन रहा है, तरंग पर तरंग छायी है, तो आप बैठे क्यों हैं? समय क्यों नष्ट करते हैं? उस समय केवल 'परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।' (१८/४४)- जो महापुरुष अव्यक्त की स्थितिवाले हैं, अविनाशी तत्त्व में स्थित हैं उनकी तथा इस पथ पर अग्रसर अपने से उन्नत लोगों की सेवा में लग जाओ। इससे दूषित संस्कार शमन होते जायेंगे, साधना में प्रवेश दिलानेवाले संस्कार सबल होते जायेंगे। क्रमशः तामसी गुण न्यून होने पर राजसी गुणों की प्रधानता तथा सात्त्विक गुण के स्वल्प संचार के साथ साधक की क्षमता वैश्य श्रेणी की हो