यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextचतुर्थ अध्याय १११९ प्रस्तुत श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने केवल श्वास पर ध्यान रखने को कहा, जबकि आगे स्वयं ओम् के जप पर बल देते हैं। गौतम बुद्ध भी 'अनापान सती' में श्वास-प्रश्वास की ही चर्चा करते हैं। अन्ततः वे महापुरुष कहना क्या चाहते हैं? वस्तुतः प्रारम्भ में बैखरी, उससे मध्यमा और उससे उन्नत होने पर जप की पश्यन्ती अवस्था में श्वास पकड़ में आता है। उस समय जप तो श्वास में ढला मिलेगा, फिर जपें क्या? फिर तो केवल श्वास को देखना भर है। इसलिये प्राण-अपान मात्र कहा, 'नाम जपो' - ऐसा नहीं कहा, कारण कि कहने की आवश्यकता नहीं है। यदि कहते हैं तो गुमराह होकर नीचे की श्रेणियों में चक्कर काटने लगेगा। महात्मा बुद्ध, 'गुरुदेव भगवान' तथा प्रत्येक महापुरुष जो इस रास्ते से गुजरे हैं, सभी एक ही बात कहते हैं। बैखरी और मध्यमा नाम-जप के प्रवेश-द्वार मात्र हैं। पश्यन्ती से ही नाम में प्रवेश मिलता है। परा में नाम धारावाही हो जाता है, जिससे जप साथ नहीं छोड़ता। मन श्वास के साथ जुड़ा है। जब श्वास पर दृष्टि है, श्वास में नाम ढल चुका है, भीतर से न तो किसी संकल्प का उत्थान है और न बाह्य वायुमण्डल के संकल्प भीतर प्रवेश कर पाते हैं, यही मन पर विजय की अवस्था है। इसी के साथ यज्ञ का परिणाम निकल आता है। अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति। सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥३०॥ दूसरे नियमित आहार करनेवाले प्राण को प्राण में ही हवन करते हैं। 'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे कि, “योगी का आहार दृढ़, आसन दृढ़ और निद्रा दृढ़ होनी चाहिये।” आहार-विहार पर नियन्त्रण बहुत आवश्यक है। ऐसे अनेक योगी प्राण को प्राण में ही हवन कर देते हैं अर्थात् श्वास लेने पर ही ध्यान केन्द्रित रखते हैं, प्रश्वास पर ध्यान नहीं देते। साँस आयी तो सुना 'ओम्', पुनः साँस आयी तो 'ओम्' सुनते रहें। इस प्रकार यज्ञों द्वारा नष्ट पापवाले ये सभी पुरुष यज्ञ के जानकार हैं। इन निर्दिष्ट विधियों में से यदि कहीं से भी करते हैं तो वे सभी यज्ञ के ज्ञाता हैं। अब यज्ञ का परिणाम बताते हैं-