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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages
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चतुर्थ अध्याय १११९ प्रस्तुत श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने केवल श्वास पर ध्यान रखने को कहा, जबकि आगे स्वयं ओम् के जप पर बल देते हैं। गौतम बुद्ध भी 'अनापान सती' में श्वास-प्रश्वास की ही चर्चा करते हैं। अन्ततः वे महापुरुष कहना क्या चाहते हैं? वस्तुतः प्रारम्भ में बैखरी, उससे मध्यमा और उससे उन्नत होने पर जप की पश्यन्ती अवस्था में श्वास पकड़ में आता है। उस समय जप तो श्वास में ढला मिलेगा, फिर जपें क्या? फिर तो केवल श्वास को देखना भर है। इसलिये प्राण-अपान मात्र कहा, 'नाम जपो' - ऐसा नहीं कहा, कारण कि कहने की आवश्यकता नहीं है। यदि कहते हैं तो गुमराह होकर नीचे की श्रेणियों में चक्कर काटने लगेगा। महात्मा बुद्ध, 'गुरुदेव भगवान' तथा प्रत्येक महापुरुष जो इस रास्ते से गुजरे हैं, सभी एक ही बात कहते हैं। बैखरी और मध्यमा नाम-जप के प्रवेश-द्वार मात्र हैं। पश्यन्ती से ही नाम में प्रवेश मिलता है। परा में नाम धारावाही हो जाता है, जिससे जप साथ नहीं छोड़ता। मन श्वास के साथ जुड़ा है। जब श्वास पर दृष्टि है, श्वास में नाम ढल चुका है, भीतर से न तो किसी संकल्प का उत्थान है और न बाह्य वायुमण्डल के संकल्प भीतर प्रवेश कर पाते हैं, यही मन पर विजय की अवस्था है। इसी के साथ यज्ञ का परिणाम निकल आता है। अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति। सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥३०॥ दूसरे नियमित आहार करनेवाले प्राण को प्राण में ही हवन करते हैं। 'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे कि, “योगी का आहार दृढ़, आसन दृढ़ और निद्रा दृढ़ होनी चाहिये।” आहार-विहार पर नियन्त्रण बहुत आवश्यक है। ऐसे अनेक योगी प्राण को प्राण में ही हवन कर देते हैं अर्थात् श्वास लेने पर ही ध्यान केन्द्रित रखते हैं, प्रश्वास पर ध्यान नहीं देते। साँस आयी तो सुना 'ओम्', पुनः साँस आयी तो 'ओम्' सुनते रहें। इस प्रकार यज्ञों द्वारा नष्ट पापवाले ये सभी पुरुष यज्ञ के जानकार हैं। इन निर्दिष्ट विधियों में से यदि कहीं से भी करते हैं तो वे सभी यज्ञ के ज्ञाता हैं। अब यज्ञ का परिणाम बताते हैं-

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१२० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम।।३१।। कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! ‘यज्ञशिष्टामृतभुजो’- यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है, जिसे अवशेष छोड़ता है, वह है अमृत। उसकी प्रत्यक्ष जानकारी ज्ञान है। उस ज्ञानामृत को भोगने अर्थात् प्राप्त करनेवाले योगीजन ‘यान्ति ब्रह्म सनातनम्’- शाश्वत सनातन परब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ कोई ऐसी वस्तु है, जो पूर्ण होते ही सनातन परब्रह्म में प्रवेश दिला देती है। यज्ञ न करें तो आपत्ति क्या है? श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञरहित पुरुष को पुनः यह मनुष्यलोक अर्थात् मानव- शरीर भी सुलभ नहीं होता, फिर अन्य लोक कैसे सुखदायी होंगे? उसके लिये तो तिर्यक् योनियाँ सुरक्षित हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। अतः यज्ञ करना मनुष्य मात्र के लिये नितान्त आवश्यक है। एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।।३२।। इस प्रकार उपर्युक्त बहुत प्रकार के यज्ञ वेद की वाणी में कहे गये हैं, ब्रह्म के मुख से विस्तारित हैं। प्राप्ति के पश्चात् महापुरुषों के शरीर को परब्रह्म धारण कर लेता है। ब्रह्म से अभिन्न अवस्थावाले उन महात्माओं की बुद्धि मात्र यन्त्र होती है। उनके द्वारा वह ब्रह्म ही बोलता है। उनकी वाणी में इन यज्ञों का विस्तार किया गया है। इन सब यज्ञों को तू ‘कर्मजान् विद्धि’- कर्म से उत्पन्न हुआ जान। यही पहले भी कह आये हैं- ‘यज्ञः कर्मसमुद्भवः’ (३/१४)। उन्हें इस प्रकार क्रियात्मक चलकर जान लेने पर (अभी बताया था, यज्ञ करके जिनका पाप नष्ट हो चुका हो, वही यज्ञ के यथार्थ ज्ञाता हैं) अर्जुन! तू ‘विमोक्ष्यसे’- संसार-बन्धन से पूर्णतः छूट जायेगा। यहाँ योगेश्वर ने कर्म स्पष्ट कर दिया। वह हरकत कर्म है, जिससे उपर्युक्त यज्ञ पूर्ण होते हैं। अब यदि दैवी सम्पद् का अर्जन, सद्गुरु का ध्यान, इन्द्रियों का संयम, श्वास का प्रश्वास में हवन, प्रश्वास का श्वास में हवन, प्राण-अपान की गति

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चतुर्थ अध्याय १२१ का निरोध खेती करने से होता हो; व्यापार, नौकरी या राजनीति करने से होता हो तो आप करिये। यज्ञ तो ऐसी क्रिया है, जो पूर्ण होते ही तत्क्षण परब्रह्म में प्रवेश दिला देती है। बाह्य किसी भी कार्य से आप तत्क्षण ब्रह्म में प्रवेश पा जाते हों तो कीजिये। वस्तुतः यह सब-के-सब यज्ञ चिन्तन की अन्तःक्रियाएँ हैं, आराधना का चित्रण है, जिससे आराध्यदेव विदित होता है। यज्ञ उस आराध्य तक की दूरी तय करने की निर्धारित प्रक्रिया-विशेष है। यह यज्ञ श्वास-प्रश्वास, प्राणायाम इत्यादि जिस क्रिया से सम्पन्न होते हैं, उस कार्य-प्रणाली का नाम कर्म है। कर्म का शुद्ध अर्थ है- 'आराधना', 'चिन्तन'। प्रायः लोग कहते हैं कि संसार में कुछ भी किया जाय, हो गया कर्म। कामना से रहित होकर कुछ भी करते जाओ, हो गया निष्काम कर्मयोग। कोई कहता है कि अधिक लाभ के लिये विदेशी वस्त्र बेचते हैं तो आप सकामी हैं। देश-सेवा के लिये स्वदेशी बेचें तो हो गया निष्काम कर्मयोग। निष्ठापूर्वक नौकरी करें, हानि-लाभ की चिन्ता से मुक्त होकर व्यापार करें, हो गया निष्काम कर्मयोग। जय-पराजय की भावना से मुक्त हो युद्ध करें, चुनाव लड़ें, हो गये निष्कर्मी। मरोगे तो मुक्ति हो जायेगी। वस्तुतः ऐसा कुछ भी नहीं है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में बताया कि इस निष्काम कर्म में निर्धारित क्रिया एक ही है- 'व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।' अर्जुन! तू निर्धारित कर्म को कर। यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। यज्ञ क्या है? श्वास- प्रश्वास का हवन, इन्द्रियों का संयम, यज्ञस्वरूप महापुरुष का ध्यान, प्राणायाम- प्राणों का निरोध। यही मन की विजितावस्था है। मन का ही प्रसार जगत् है। श्रीकृष्ण के ही शब्दों में, 'इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।' (५/१९)- उन पुरुषों द्वारा चराचर जगत् यहीं जीत लिया गया, जिनका मन समत्व में स्थित है। भला मन के समत्व और जगत् के जीतने से क्या सम्बन्ध है? यदि जगत् को जीत ही लिया तो रुका कहाँ पर? तब कहते हैं- वह ब्रह्म निर्दोष और सम है, इधर मन भी निर्दोष और समत्व की स्थितिवाला हो गया, अतः वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है।

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१२२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता सारांशतः मन का प्रसार ही जगत् है। चराचर जगत् ही हवन-सामग्री के रूप में है। मन के सर्वथा निरोध होते ही जगत् का निरोध हो जाता है। मन के निरोध के साथ ही यज्ञ का परिणाम निकल आता है। यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है, उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला पुरुष सनातन ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाता है। यह सभी यज्ञ ब्रह्मस्थित महापुरुषों की वाणी द्वारा कहे गये हैं। ऐसा नहीं कि अलग-अलग सम्प्रदायों के साधक अलग-अलग प्रकार के यज्ञ करते हैं, बल्कि ये सभी यज्ञ एक ही साधक की ऊँची-नीची अवस्थाएँ हैं। यह यज्ञ जिससे होने लगे, उस क्रिया का नाम कर्म है। सम्पूर्ण गीता में एक भी श्लोक ऐसा नहीं है, जो सांसारिक कार्य-व्यापारों का समर्थन करता हो। प्रायः यज्ञ का नाम आने पर लोग बाहर एक यज्ञ-वेदी बनाकर तिल, जौ लेकर ‘स्वाहा’ बोलते हुए हवन प्रारम्भ कर देते हैं। यह एक धोखा है। द्रव्ययज्ञ दूसरा है, जिसे श्रीकृष्ण ने कई बार कहा। पशुबलि, वस्तु-दाह इत्यादि से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।।३३।। अर्जुन! सांसारिक द्रव्यों से सिद्ध होनेवाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ [जिसका परिणाम ज्ञान (साक्षात्कार) है, यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है उस अमृततत्त्व की जानकारी का नाम ज्ञान है, ऐसा यज्ञ] श्रेयस्कर है, परमकल्याणकारी है। हे पार्थ! सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में शेष हो जाते हैं, ‘परिसमाप्यते’- भली प्रकार समाहित हो जाते हैं। ज्ञान यज्ञ की पराकाष्ठा है। उसके पश्चात् कर्म किये जाने से न कोई लाभ है और न छोड़ देने से उस महापुरुष की कोई क्षति ही होती है। इस प्रकार भौतिक द्रव्यों से होनेवाले यज्ञ भी यज्ञ हैं; किन्तु उस यज्ञ की तुलना में, जिसका परिणाम साक्षात्कार है, उस ज्ञानयज्ञ की अपेक्षा अत्यन्त अल्प हैं। आप करोड़ों का हवन करें, सैकड़ों यज्ञवेदी बना लें, सत्पथ पर द्रव्य लगावें, साधु-सन्त-महापुरुषों की सेवा में द्रव्य लगावें; किन्तु इस ज्ञानयज्ञ की अपेक्षा अत्यन्त अल्प हैं। वस्तुतः यज्ञ श्वास-प्रश्वास का है, इन्द्रियों के संयम

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चतुर्थ अध्याय १२३ का है, मन के निरोध का है, जैसा श्रीकृष्ण अभी बता आये हैं। इस यज्ञ को प्राप्त कहाँ से किया जाय? उसकी विधि कहाँ से सीखें? मन्दिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों में मिलेगा या पुस्तकों में? तीर्थयात्राओं में मिलेगा या स्नान करने से मिलेगा? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, उसका तो एक ही स्रोत है तत्त्वस्थित महापुरुष। तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥३४॥ इसलिये अर्जुन! तू तत्त्वदर्शी महापुरुष के पास जाकर भली प्रकार प्रणत होकर (दण्डवत्-प्रणाम करके, अहंकार त्यागकर, शरण होकर) भली प्रकार सेवा करके, निष्कपट भाव से प्रश्न करके तू उस ज्ञान को जान। वे तत्त्व को जाननेवाले ज्ञानीजन तेरे लिये उस ज्ञान का उपदेश करेंगे, साधना- पथ पर चलायेंगे। समर्पित भाव से सेवा करने के उपरान्त ही इस ज्ञान को सीखने की क्षमता आती है। तत्त्वदर्शी महापुरुष परमतत्त्व परमात्मा का प्रत्यक्ष दिग्दर्शन करनेवाले हैं। वे यज्ञ की विधि-विशेष के ज्ञाता हैं और वही आपको भी सिखायेंगे। यदि अन्य यज्ञ होता, तो ज्ञानी-तत्त्वदर्शी की क्या आवश्यकता थी? स्वयं भगवान के सामने ही तो अर्जुन खड़ा था, भगवान उसे तत्त्वदर्शी के पास क्यों भेजते हैं? वस्तुतः श्रीकृष्ण एक योगी थे। उनका आशय है कि आज तो अनुरागी अर्जुन मेरे समक्ष उपस्थित है, भविष्य में अनुरागियों को कहीं भ्रम न हो जाय कि श्रीकृष्ण तो चले गये, अब किसकी शरण जायँ? इसलिये उन्होंने स्पष्ट किया कि तत्त्वदर्शी के पास जाओ। वे ज्ञानीजन तुझे उपदेश करेंगे। और- यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥३५॥ उस ज्ञान को उनके द्वारा समझकर तू इस प्रकार फिर कभी मोह को प्राप्त नहीं होगा। उनसे दी गयी जानकारी के द्वारा उस पर चलते हुए तू अपनी आत्मा के अन्तर्गत सम्पूर्ण भूतों को देखेगा अर्थात् सभी प्राणियों में इसी

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१२४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता आत्मा का प्रसार देखेगा। जब सर्वत्र एक ही आत्मा के प्रसार को देखने की क्षमता आ जायेगी, उसके पश्चात् तू मुझमें प्रवेश करेगा। अतः उस परमात्मा को पाने का साधन 'तत्त्वस्थित महापुरुष' के द्वारा है। ज्ञान के सम्बन्ध में, धर्म और शाश्वत सत्य के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण के अनुसार किसी तत्त्वदर्शी से ही पूछने का विधान है। अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि।।३६।। यदि तू सब पापियों से भी अधिक पाप करनेवाला है, तब भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा सभी पापों से निःसन्देह भली प्रकार तर जायेगा। इसका आशय आप यह न लगा लें कि अधिक-से-अधिक पाप करके कभी भी तर जायेंगे। श्रीकृष्ण का आशय मात्र यही है कि कहीं आप भ्रम में न रहें कि 'हम तो बड़े पापी हैं', 'हमसे पार नहीं लगेगा'- ऐसी कोई गुंजाइश न निकालें, इसलिये श्रीकृष्ण प्रोत्साहन और आश्वासन देते हैं कि सब पापियों के पापों के समूह से भी अधिक पाप करनेवाला हो, फिर भी तत्त्वदर्शियों से प्राप्त ज्ञानरूपी नौका द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पापों को अच्छी प्रकार पार कर जायेगा। किस प्रकार?- यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।३७।। अर्जुन ! जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, ठीक उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्म कर देती है। यह ज्ञान की प्रवेशिका नहीं है जहाँ से यज्ञ में प्रवेश मिलता है वरन् यह ज्ञान अर्थात् साक्षात्कार की पराकाष्ठा का चित्रण है, जिसमें पहले विजातीय कर्म भस्म होते हैं और फिर प्राप्ति के साथ चिन्तन-कर्म भी उसी में विलय हो जाते हैं। जिसे पाना था पा लिया, अब आगे चिन्तन कर किसे ढूँढ़े? ऐसा साक्षात्कारवाला ज्ञानी सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्मों का अन्त कर लेगा। वह साक्षात्कार होगा कहाँ? बाहर होगा अथवा भीतर? इस पर कहते हैं- न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति।।३८।।

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चतुर्थ अध्याय १२५ इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करनेवाला निःसन्देह कुछ भी नहीं है। इस ज्ञान (साक्षात्कार) को तू स्वयं (दूसरा नहीं) योग की परिपक्व अवस्था में (आरम्भ में नहीं) अपनी आत्मा के अन्तर्गत हृदय-देश में ही अनुभव करेगा, बाहर नहीं। इस ज्ञान के लिये कौन-सी योग्यता अपेक्षित है? योगेश्वर के ही शब्दों में- श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥३९॥ श्रद्धावान्, तत्पर तथा संयतेन्द्रिय पुरुष ही ज्ञान प्राप्त कर पाता है। भावपूर्वक जिज्ञासा नहीं है तो तत्त्वदर्शी की शरण जाने पर भी ज्ञान नहीं प्राप्त होता। केवल श्रद्धा ही पर्याप्त नहीं है, श्रद्धावान् शिथिल प्रयत्न भी हो सकता है। अतः महापुरुष द्वारा निर्दिष्ट पथ पर तत्परता से अग्रसर होने की लगन आवश्यक है। इसके साथ ही सम्पूर्ण इन्द्रियों का संयम अनिवार्य है। जो वासनाओं से विरत नहीं है, उसके लिये साक्षात्कार (ज्ञान की प्राप्ति) कठिन है। केवल श्रद्धावान्, आचरणरत संयतेन्द्रिय पुरुष ही ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त कर वह तत्क्षण परमशान्ति को प्राप्त हो जाता है, जिसके पश्चात् कुछ भी पाना शेष नहीं रहता। यही अन्तिम शान्ति है। फिर वह कभी अशान्त नहीं होता। और जहाँ श्रद्धा नहीं है- अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४०॥ अज्ञानी, जो यज्ञ की विधि-विशेष से अनभिज्ञ है एवं श्रद्धारहित तथा संशययुक्त पुरुष इस परमार्थ पथ से भ्रष्ट हो जाता है। उनमें भी संशययुक्त पुरुष के लिये न तो सुख है, न पुनः मनुष्य-शरीर है और न परमात्मा ही। अतः तत्त्वदर्शी महापुरुष के पास जाकर इस पथ के संशयों का निवारण कर लेना चाहिये अन्यथा वे वस्तु का परिचय कभी नहीं पायेंगे। फिर पाता कौन है?- योगसन्न्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्। आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४१॥

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१२६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता जिसके कर्म योग द्वारा भगवान में समाहित हो चुके हैं, जिसका सम्पूर्ण संशय परमात्मा की प्रत्यक्ष जानकारी द्वारा नष्ट हो गया है, परमात्मा से संयुक्त ऐसे पुरुष को कर्म नहीं बाँधते। योग के द्वारा ही कर्मों का शमन होगा, ज्ञान से ही संशय नष्ट होगा। अतः श्रीकृष्ण कहते हैं- तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः। छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।४२।। इसलिये भारतवंशी अर्जुन! तू योग में स्थित हो और अज्ञान से उत्पन्न हुए हृदय में स्थित अपने इस संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काट। युद्ध के लिये खड़ा हो। जब साक्षात्कार में बाधक संशयरूपी शत्रु मन के भीतर है तो बाहर कोई किसी से क्यों लड़ेगा? वस्तुतः जब आप चिन्तन-पथ पर अग्रसर होते हैं, तब संशय से उत्पन्न बाह्य प्रवृत्तियाँ बाधा के रूप में स्वाभाविक हैं। ये शत्रु के रूप में भयंकर आक्रमण करती हैं। संयम के साथ यज्ञ की विधि- विशेष का आचरण करते हुए इन विकारों का पार पाना ही युद्ध है, जिसका परिणाम परमशान्ति है। यही अन्तिम विजय है, जिसके पीछे हार नहीं है। निष्कर्ष- इस अध्याय के आरम्भ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि इस योग को आरम्भ में मैंने सूर्य के प्रति कहा, सूर्य ने मनु से और मनु ने इक्ष्वाकु के प्रति कहा और उनसे राजर्षियों ने जाना। मैंने अथवा अव्यक्त स्थितिवाले ने कहा। महापुरुष भी अव्यक्त स्वरूपवाला ही है। शरीर तो उसके रहने का मकान मात्र है। ऐसे महापुरुष की वाणी में परमात्मा ही प्रवाहित होता है। ऐसे किसी महापुरुष से योग सूर्य द्वारा संचारित होता है। उस परम प्रकाशरूप का प्रसार सुरा के अन्तराल में होता है इसलिये सूर्य के प्रति कहा। श्वास में संचारित होकर वे संस्काररूप में आ गये। सुरा में संचित रहने पर, समय आने पर वही मन में संकल्प बनकर आ जाता है। उसकी महत्ता समझने पर मन में उस वाक्य के प्रति इच्छा जागृत होती है और योग कार्यरूप ले लेता है। क्रमशः उत्थान करते-करते यह योग ऋद्धियों-सिद्धियों की राजर्षित्व श्रेणी तक पहुँचने

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चतुर्थ अध्याय १२७ पर नष्ट होने की स्थिति में जा पहुँचता है; किन्तु जो प्रिय भक्त है, अनन्य सखा है उसे महापुरुष ही सँभाल लेते हैं। अर्जुन के प्रश्न करने पर कि आपका जन्म तो अब हुआ है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया- अव्यक्त, अविनाशी, अजन्मा और सम्पूर्ण भूतों में प्रवाहित होने पर भी आत्ममाया, योग-प्रक्रिया द्वारा अपनी त्रिगुणमयी प्रकृति को वश में करके मैं प्रकट होता हूँ। प्रकट होकर करते क्या हैं? साध्य वस्तुओं को परित्राण देने तथा जिनसे दूषित उत्पन्न होते हैं उनका विनाश करने के लिये, परमधर्म परमात्मा को स्थिर करने के लिये मैं आरम्भ से पूर्तिपर्यन्त पैदा होता हूँ। मेरा वह जन्म और कर्म दिव्य है। उसे केवल तत्त्वदर्शी ही जान पाते हैं। भगवान का आविर्भाव तो कलियुग की अवस्था से ही हो जाता है, यदि सच्ची लगन हो; किन्तु आरम्भिक साधक समझ ही नहीं पाता कि यह भगवान बोल रहे हैं या योंही संकेत मिल रहे हैं। आकाश से कौन बोलता है? ‘महाराज जी’ बताते थे कि जब भगवान कृपा करते हैं, आत्मा से रथी हो जाते हैं तो खम्भे से, वृक्ष से, पत्ते से, शून्य से हर स्थान से बोलते और सँभालते हैं। उत्थान होते-होते जब परमतत्त्व परमात्मा विदित हो जाय, तभी स्पर्श के साथ ही वह स्पष्ट समझ पाता है। इसलिये अर्जुन! मेरे उस स्वरूप को तत्त्वदर्शियों ने देखा और मुझे जानकर वे तत्क्षण मुझमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं, जहाँ से पुनः आवागमन में नहीं आते। इस प्रकार उन्होंने भगवान के आविर्भाव की विधि को बताया कि वह किसी अनुरागी के हृदय में होता है, बाहर कदापि नहीं। श्रीकृष्ण ने बताया- मुझे कर्म नहीं बाँधते और इस स्तर से जो जानता है, उसे भी कर्म नहीं बाँधते। यही समझकर मुमुक्षु पुरुषों ने कर्म का आरम्भ किया था कि उस स्तर से जानेंगे तो जैसे श्रीकृष्ण वैसा ही उस स्तर से जाननेवाला वह पुरुष, और जान लेने पर वैसा ही वह मुमुक्षु अर्जुन। यह उपलब्धि निश्चित है, यदि यज्ञ किया जाय। यज्ञ का स्वरूप बताया। यज्ञ का परिणाम परमतत्त्व, परमशान्ति बताया। इस ज्ञान को पाया कहाँ जाय? इस पर किसी तत्त्वदर्शी के पास जाने और उन्हीं विधियों से पेश आने को कहा, जिससे वे महापुरुष अनुकूल हो जायँ।

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१२८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता योगेश्वर ने स्पष्ट किया कि वह ज्ञान तू स्वयं आचरण करके पायेगा, दूसरे के आचरण से तुझे नहीं मिलेगा। वह भी योग की सिद्धि के काल में प्राप्त होगा, प्रारम्भ में नहीं। वह ज्ञान (साक्षात्कार) हृदय-देश में होगा, बाहर नहीं। श्रद्धालु, तत्पर, संयतेन्द्रिय एवं संशयरहित पुरुष ही उसे प्राप्त करता है। अतः हृदय में स्थित अपने संशय को वैराग्य की तलवार से काट। यह हृदय-देश की लड़ाई है। बाह्य युद्ध से गीतोक्त युद्ध का कोई प्रयोजन नहीं है। इस अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मुख्य रूप से यज्ञ का स्वरूप स्पष्ट किया और बताया कि यज्ञ जिससे पूरा होता है, उसे करने (कार्य-प्रणाली) का नाम कर्म है। कर्म को भली प्रकार इसी अध्याय में स्पष्ट किया, अतः- ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे 'यज्ञकर्मस्पष्टीकरणम्' नाम चतुर्थोऽध्यायः।।४।। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में 'यज्ञकर्म-स्पष्टीकरण' नामक चौथा अध्याय पूर्ण होता है। इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थगीता' भाष्ये 'यज्ञकर्मस्पष्टीकरणम्' नाम चतुर्थोऽध्यायः।।४।। इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्द जी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत 'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'यज्ञकर्म-स्पष्टीकरण' नामक चौथा अध्याय पूर्ण होता है। ।। हरिः ॐ तत्सत् ।।

पञ्चमोऽध्यायः यज्ञभोक्ता महापुरुषस्थ महेश्वर

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।। ॐ श्री परमात्मने नमः ।। ।। अथ पञ्चमोऽध्यायः ।। अध्याय तीन में अर्जुन ने प्रश्न रखा कि- भगवन्! जब ज्ञानयोग आपको श्रेष्ठ मान्य है, तो आप मुझे भयंकर कर्मों में क्यों लगाते हैं? अर्जुन को निष्काम कर्मयोग की अपेक्षा ज्ञानयोग कुछ सरल प्रतीत हुआ लगता है; क्योंकि ज्ञानयोग में हारने पर देवत्व और विजय में महामहिम स्थिति, दोनों ही दशाओं में लाभ ही लाभ प्रतीत हुआ। अब तक अर्जुन ने भली प्रकार समझ लिया है कि दोनों ही मार्गों में कर्म तो करना ही पड़ेगा (योगेश्वर उसे संशयरहित होकर तत्त्वदर्शी महापुरुष की शरण लेने के लिये भी प्रेरित करते हैं; क्योंकि समझने के लिये वही एक स्थान है।) अतः दोनों मार्गों में से एक चुनने से पूर्व उसने निवेदन किया- अर्जुन उवाच सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि। यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्।।१।। हे श्रीकृष्ण! आप कभी संन्यास-माध्यम से किये जानेवाले कर्म की और कभी निष्काम-दृष्टि से किये जानेवाले कर्म की प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में से एक, जो भली प्रकार आपका निश्चय किया हुआ हो, जो परमकल्याणकारी हो उसे मेरे लिये कहिये। कहीं जाने के लिये आपको दो मार्ग बताये जायें तो आप सुविधाजनक मार्ग अवश्य पूछेंगे। यदि नहीं पूछते तो आप जानेवाले नहीं हैं। इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- श्रीभगवानुवाच सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।२।। अर्जुन! संन्यास-माध्यम से किया जानेवाला कर्म अर्थात् ज्ञानमार्ग से किया जानेवाला कर्म और 'कर्मयोगः'- निष्काम-भावना से किया जानेवाला

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१३० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता कर्म- ये दोनों ही परमश्रेय को दिलानेवाले हैं; परन्तु इन दोनों मार्गों से संन्यास अथवा ज्ञानदृष्टि से किये जानेवाले कर्म की अपेक्षा निष्काम कर्मयोग श्रेष्ठ है। प्रश्न स्वाभाविक है कि श्रेष्ठ क्यों है? ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥३॥ महाबाहु अर्जुन! जो न किसी से द्वेष करता है, न किसी की आकांक्षा करता है वह सदैव संन्यासी ही समझने योग्य है। चाहे वह ज्ञानमार्ग से या निष्काम कर्ममार्ग से ही क्यों न हो। राग, द्वेषादि द्वन्द्वों से रहित वह पुरुष सुखपूर्वक भवबन्धन से मुक्त हो जाता है। साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥४॥ निष्काम कर्मयोग तथा ज्ञानयोग इन दोनों को वही अलग-अलग बताते हैं जिनकी समझ इस पथ में अभी बहुत हल्की है, न कि पूर्णज्ञाता पण्डित लोग; क्योंकि दोनों में से एक में भी अच्छी प्रकार स्थित हुआ पुरुष दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है। दोनों का फल एक है, इसलिये दोनों एक ही समान हैं। यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥५॥ जहाँ सांख्य-दृष्टि से कर्म करनेवाला पहुँचता है, वहीं निष्काम-माध्यम से कर्म करनेवाला भी पहुँचता है। इसलिये जो दोनों को फल की दृष्टि से एक देखता है, वही यथार्थ जाननेवाला है। जब दोनों एक ही स्थान पर पहुँचते हैं तो निष्काम कर्मयोग विशेष क्यों? श्रीकृष्ण बताते हैं- संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥६॥ अर्जुन! निष्काम कर्मयोग का आचरण किये बिना ‘संन्यासः’- अर्थात् सर्वस्व का न्यास प्राप्त होना दुःखप्रद है। जब योग का आचरण प्रारम्भ ही नहीं किया तो असम्भव-सा है। इसलिये भगवत्स्वरूप का मनन करनेवाला मुनि,

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पञ्चम अध्याय १३१ जिसकी मनसहित इन्द्रियाँ मौन हैं, निष्काम कर्मयोग का आचरण करके परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है। स्पष्ट है कि ज्ञानयोग में निष्काम कर्मयोग का ही आचरण करना पड़ेगा; क्योंकि क्रिया दोनों में एक ही है- वही यज्ञ की क्रिया, जिसका शुद्ध अर्थ है ‘आराधना’। दोनों मार्गों में अन्तर केवल कर्त्ता के दृष्टिकोण का है। एक अपनी शक्ति को समझकर हानि-लाभ देखते हुए इसी कर्म में प्रवृत्त होता है और दूसरा निष्काम कर्मयोगी इष्ट पर निर्भर होकर इसी क्रिया में प्रवृत्त होता है। उदाहरणार्थ, एक प्राइवेट पढ़ता है दूसरा नॉमिनेट। दोनों का पाठ्यक्रम एक है, परीक्षा एक है, परीक्षक-निरीक्षक दोनों में एक ही हैं। ठीक इसी प्रकार दोनों के सद्गुरु तत्त्वदर्शी हैं और डिग्री एक ही है। केवल दोनों के पढ़ने का दृष्टिकोण भिन्न है। हाँ, संस्थागत छात्र को सुविधाएँ अधिक रहती हैं। पीछे श्रीकृष्ण ने कहा कि काम और क्रोध दुर्जय शत्रु हैं, अर्जुन! इन्हें तू मार। अर्जुन को लगा कि यह तो बड़ा कठिन है; किन्तु श्रीकृष्ण ने कहा- नहीं, शरीर से परे इन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियों से परे मन है, मन से परे बुद्धि है, बुद्धि से परे तुम्हारा स्वरूप है। तुम वहाँ से प्रेरित हो। इस प्रकार अपनी हस्ती समझकर, अपनी शक्ति को सामने रखकर, स्वावलम्बी होकर कर्म में प्रवृत्त होना 'ज्ञानयोग' है। श्रीकृष्ण ने कहा है- चित्त को ध्यानस्थ करते हुए, कर्मों को मुझमें समर्पण करके आशा, ममता और सन्तापरहित होकर युद्ध कर। समर्पण के साथ इष्ट पर निर्भर होकर उसी कर्म में प्रवृत्त होना निष्काम कर्मयोग है। दोनों की क्रिया एक है और परिणाम भी एक है। इसी पर बल देकर योगेश्वर श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं कि योग का आचरण किये बिना संन्यास अर्थात् शुभाशुभ कर्मों के अन्त की स्थिति का प्राप्त होना असम्भव है। श्रीकृष्ण के अनुसार ऐसा कोई योग नहीं है कि हाथ- पर-हाथ रखकर बैठे-बैठे कहें कि- “मैं परमात्मा हूँ, शुद्ध हूँ, बुद्ध हूँ, मेरे लिये न तो कर्म है न बन्धन। मैं भला-बुरा कुछ करता दिखायी पड़ता भी हूँ तो इन्द्रियाँ अपने अर्थों में बरत रही हैं।” ऐसा पाखण्ड श्रीकृष्ण के शब्दों में कदापि नहीं है। साक्षात् योगेश्वर भी अपने अनन्य सखा अर्जुन को बिना कर्म के यह स्थिति नहीं दे सके। यदि ऐसा वे कर सकते तो गीता की आवश्यकता

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१३२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता ही क्या थी? कर्म तो करना ही पड़ेगा। कर्म करके ही संन्यास की स्थिति को पाया जा सकता है और योगयुक्त पुरुष शीघ्र ही परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। योगयुक्त पुरुष के लक्षण क्या हैं? इस पर कहते हैं- योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥७॥ ‘विजितात्मा’- विशेष रूप से जीता हुआ है शरीर जिसका, ‘जितेन्द्रियः’- जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी और ‘विशुद्धात्मा’- विशेष रूप से शुद्ध है अन्तःकरण जिसका, ऐसा पुरुष ‘सर्वभूतात्मभूतात्मा’- सम्पूर्ण भूतप्राणियों के आत्मा के मूल उद्गम परमात्मा से एकीभाव हुआ योग से युक्त है। वह कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता। तो करता क्यों है? पीछेवालों में परमकल्याणकारी बीज का संग्रह करने के लिये। लिप्त क्यों नहीं होता? क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का जो मूल उद्गम है, जिसका नाम परमतत्त्व है उस तत्त्व में वह स्थित हो गया। आगे कोई वस्तु नहीं जिसकी शोध करे। पीछेवाली वस्तुएँ छोटी पड़ गयीं तो भला आसक्ति किसमें करे? इसलिये वह कर्मों से आवृत्त नहीं होता। यह योगयुक्त की पराकाष्ठा का चित्रण है। पुनः योगयुक्त पुरुष की रहनी स्पष्ट करते हैं कि वह करते हुए भी उससे लिप्त क्यों नहीं होता?- नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥८॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥९॥ परमतत्त्व परमात्मा को साक्षात्कारसहित जाननेवाले योगयुक्त पुरुष की यह मनःस्थिति अर्थात् अनुभूति है कि मैं किंचित् मात्र भी कुछ नहीं करता हूँ। यह उसकी कल्पना नहीं, बल्कि यह स्थिति उसने कर्म करके पायी है। यथा ‘युक्तो मन्येत’- अब प्राप्ति के पश्चात् वह सब कुछ देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता, सूँघता, भोजन करता, गमन करता, सोता, श्वास लेता, बोलता, त्याग करता, ग्रहण करता, आँखों को खोलता और मींचता हुआ भी ‘इन्द्रियाँ अपने अर्थों में बरतती हैं’- ऐसी धारणावाला होता है। परमात्मा से बढ़कर कुछ है ही नहीं और जब उसमें वह स्थित ही है तो उससे बढ़कर किस

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पञ्चम अध्याय १३३ सुख की कामना से वह किसका दर्शन, स्पर्श इत्यादि करेगा? यदि कोई श्रेष्ठ वस्तु आगे होती तो आसक्ति अवश्य रहती। किन्तु प्राप्ति के बाद अब और आगे जायेगा कहाँ और पीछे त्यागेगा क्या? इसलिये योगयुक्त पुरुष लिप्त नहीं होता। इसी को एक उदाहरण के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं- ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।।१०।। कमल कीचड़ में होता है। उसका पत्ता पानी के ऊपर तैरता है। लहरें रात-दिन उसके ऊपर से गुजरती हैं; किन्तु आप पत्ते को देखें, सूखा मिलेगा। जल की एक बूँद भी उस पर टिक नहीं पाती। कीचड़ और जल में रहते हुए भी वह उनसे लिप्त नहीं होता। ठीक इसी प्रकार, जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में विलय करके (साक्षात्कार के साथ ही कर्मों का विलय होता है, इससे पूर्व नहीं), आसक्ति को त्याग करके (अब आगे कोई वस्तु नहीं अतः आसक्ति नहीं रहती, इसलिये आसक्ति त्यागकर) कर्म करता है, वह भी इसी प्रकार लिप्त नहीं होता। फिर वह करता क्यों है? आपलोगों के लिये, समाज के कल्याण- साधन के लिये, पीछेवालों के मार्गदर्शन के लिये। इसी पर बल देते हैं- कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ।।११।। योगीजन केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति त्यागकर आत्मशुद्धि के लिए कर्म करते हैं। जब कर्म ब्रह्म में विलीन हो चुके तो क्या अब भी आत्मा अशुद्ध ही है? नहीं, वे 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' हो चुके हैं। सम्पूर्ण प्राणियों में वे अपनी ही आत्मा का प्रसार पाते हैं। उन समस्त आत्माओं की शुद्धि के लिये, आप सबका मार्गदर्शन करने के लिये वे कर्म में बरतते हैं। शरीर, मन, बुद्धि तथा केवल इन्द्रियों से वह कर्म करता है, स्वरूप से वह कुछ भी नहीं करता, स्थिर है। बाहर से वह सक्रिय दिखायी देता है; किन्तु भीतर उसमें असीम शान्ति है। रस्सी जल चुकी, मात्र ऐंठन (आकार) शेष है, जिससे बँध नहीं सकता। युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्। अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ।।१२।।

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१३४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता 'योगयुक्त' अर्थात् योग के परिणाम को प्राप्त पुरुष, जो सब प्राणियों के आत्मा के मूल परमात्मा में स्थित है, ऐसा योगी कर्म के फल को त्यागकर (कर्मों का फल परमात्मा उससे भिन्न नहीं है, इसलिये अब कर्मफल को त्यागकर) 'नैष्ठिकीम् शान्तिम् आप्नोति'– शान्ति की अन्तिम अवस्था को प्राप्त होता है, जिसके आगे कोई शान्ति शेष नहीं है, जिसके पश्चात् वह कभी अशान्त नहीं होगा। किन्तु अयुक्त पुरुष, जो योग के परिणाम से युक्त नहीं है, अभी रास्ते में है ऐसा पुरुष फल में आसक्त हुआ (फल है परमात्मा, उसमें उसका आसक्त होना आवश्यक है। इसलिये फल में आसक्त होने पर भी) 'कामकारेण निबध्यते'–कामना करके बँध जाता है अर्थात् पूर्तिपर्यन्त कामनाएँ जागृत होती हैं, अतः साधक को पूर्तिपर्यन्त सावधान रहना चाहिये। 'महाराज जी' कहा करें– “हो ! तनिकौ हम अलग, भगवान अलग हैं तो माया कामयाब हो सकती है।” कल ही प्राप्ति होनी हो किन्तु आज तो वह अज्ञानी ही है। अतः पूर्तिपर्यन्त साधक को असावधान नहीं होना चाहिये। इसी पर आगे देखें– सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्।।१३।। जो सम्पूर्ण रूप से स्ववश है, जो शरीर, मन, बुद्धि और प्रकृति से परे स्वयं में स्थित है, ऐसा वशी पुरुष निःसन्देह न कुछ करता है न कराता है। पीछेवालों से कराना भी उसकी आन्तरिक शान्ति का स्पर्श नहीं कर पाता। ऐसा स्वरूपस्थ पुरुष शब्दादि विषयों को उपलब्ध करानेवाले नौ द्वारों (दो कान, दो नेत्र, दो नासिका छिद्र, एक मुख, उपस्थ एवं पायु) वाले शरीररूपी घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर स्वरूपानन्द में ही स्थित रहता है। यथार्थतः वह न कुछ करता है और न कराता है। इसी को पुनः श्रीकृष्ण दूसरे शब्दों में कहते हैं कि वह प्रभु न करता है, न कराता है। सद्गुरु, भगवान, प्रभु, स्वरूपस्थ महापुरुष, युक्त इत्यादि एक– दूसरे के पर्याय हैं। अलग से कोई भगवान कुछ करने नहीं आता। वह जब करता है तो इन्हीं स्वरूपस्थ इष्ट के माध्यम से कराता है। महापुरुष के लिये शरीर एक मकान मात्र है। अतः परमात्मा का करना और महापुरुष का करना एक ही बात है; क्योंकि वह उनके द्वारा है। वस्तुतः वह पुरुष करते हुए भी

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पञ्चम अध्याय १३५ कुछ नहीं करता। इसी पर अगला श्लोक देखें- न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४॥ वह प्रभु न तो भूतप्राणियों के कर्त्तापन को, न कर्मों को और न कर्मफलों का संयोग ही बैठाता है, बल्कि स्वभाव में स्थित प्रकृति के दबाव के अनुसार ही सभी बरतते हैं। जैसी जिसकी प्रकृति- सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी है, उसी स्तर से वह बरतता है। प्रकृति तो लम्बी-चौड़ी है, लेकिन आपके ऊपर उतना ही प्रभाव डाल पाती है जितना आपका स्वभाव विकृत अथवा विकसित है। प्रायः लोग कहते हैं कि करने-करानेवाले तो भगवान हैं, हम तो यन्त्रमात्र हैं। हमसे वे भला करावें अथवा बुरा। किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि न वह प्रभु स्वयं करता है, न कराता है और न वह जुगाड़ ही बैठाता है। लोग अपने स्वभाव में स्थित प्रकृति के अनुरूप बरतते हैं। स्वतः कार्य करते हैं। वे अपने आदत से मजबूर होकर करते हैं, भगवान नहीं करते। तब लोग कहते क्यों हैं कि भगवान करते हैं? इस पर योगेश्वर बताते हैं- नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥१५॥ जिसे अभी प्रभु कहा, उसी को यहाँ विभु कहा गया है; क्योंकि वह सम्पूर्ण वैभव से संयुक्त है। प्रभुता एवं वैभव से संयुक्त वह परमात्मा न किसी के पापकर्म को और न किसी के पुण्यकर्मों को ही ग्रहण करता है; फिर भी लोग कहते क्यों हैं? इसलिये कि अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है। उन्हें अभी साक्षात्कारसहित ज्ञान तो हुआ नहीं, वे अभी जन्तु हैं। मोहवश वे कुछ भी कह सकते हैं। ज्ञान से क्या होता है? इसे स्पष्ट करते हैं- ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥१६॥ जिसके अन्तःकरण का वह अज्ञान (जिसने ज्ञान को ढँक रखा था) आत्मसाक्षात्कार द्वारा नष्ट हो गया है और इस प्रकार जिसने ज्ञान प्राप्त कर

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१३६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता लिया है, उसका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस परमतत्त्व परमात्मा को प्रकाशित करता है। तो क्या परमात्मा किसी अन्धकार का नाम है? नहीं, वह तो ‘परम प्रकास रूप दिन राती।’ ( रामचरितमानस, ७/११९/३ )– परम प्रकाशरूप है। है तो, किन्तु हमारे उपभोग के लिये तो नहीं है, दिखायी तो नहीं देता? जब ज्ञान द्वारा अज्ञान का आवरण हट जाता है तो उसका वह ज्ञान सूर्य के सदृश परमात्मा को अपने में प्रवाहित कर लेता है। फिर उस पुरुष के लिये कहीं अन्धकार नहीं रह जाता। उस ज्ञान का स्वरूप क्या है?- तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः। गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः।।१७।। जब उस परमतत्त्व परमात्मा के अनुरूप बुद्धि हो, तत्त्व के अनुरूप प्रवाहित मन हो, परमतत्त्व परमात्मा में एकीभाव से उसकी रहनी हो और उसी के परायण हो, इसी का नाम ज्ञान है। ज्ञान कोई बकवास या बहस नहीं है। इस ज्ञान द्वारा पापरहित हुआ पुरुष पुनरागमनरहित परमगति को प्राप्त होता है। परमगति को प्राप्त, पूर्ण जानकारी से युक्त पुरुष ही पण्डित कहलाते हैं। आगे देखें- विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।१८।। ज्ञान के द्वारा जिनका पाप शमन हो चुका है, जो ‘अपुनरावर्ती परमगति’ को प्राप्त हैं, ऐसे ज्ञानीजन विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण तथा चाण्डाल में, गाय और कुत्ते में तथा हाथी में समान दृष्टिवाले होते हैं। उनकी दृष्टि में विद्या- विनययुक्त ब्राह्मण न तो कोई विशेषता रखता है और न चाण्डाल कोई हीनता रखता है। न गाय धर्म है, न कुत्ता अधर्म और न हाथी विशालता ही रखता है। ऐसे पण्डित, ज्ञाताजन समदर्शी और समवर्ती होते हैं। उनकी दृष्टि चमड़ी पर नहीं रहती, बल्कि आत्मा पर पड़ती है। अन्तर केवल इतना है, विद्या- विनयसम्पन्न स्वरूप के समीप है और शेष कुछ पीछे हैं। कोई एक मंजिल आगे है, तो कोई पिछले पड़ाव पर। शरीर तो वस्त्र है। उनकी दृष्टि वस्त्र को महत्त्व नहीं देती अपितु उनके हृदय में स्थित आत्मा पर पड़ती है, इसलिये वे कोई भेद नहीं रखते।

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पञ्चम अध्याय १३७ श्रीकृष्ण ने पर्याप्त गो-सेवा की थी। उन्हें गाय के प्रति गौरवपूर्ण शब्द कहना चाहिये था; किन्तु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा। श्रीकृष्ण ने गाय को धर्म में कोई स्थान नहीं दिया। उन्होंने केवल इतना माना कि अन्य जीवात्माओं की तरह उसमें भी आत्मा है। गाय का आर्थिक महत्त्व जो भी हो, उसका धार्मिक वैशिष्ट्य परवर्ती लोगों की देन है। श्रीकृष्ण ने पीछे बताया कि अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये वे अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। दिखावटी शोभायुक्त वाणी में वे उसे व्यक्त भी करते हैं। उनकी वाणी की छाप जिनके चित्त पर पड़ती है, उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है। वे कुछ पाते नहीं, नष्ट हो जाते हैं। जबकि निष्काम कर्मयोग में अर्जुन ! निर्धारित क्रिया एक ही है- यज्ञ की प्रक्रिया 'आराधना'। गाय, कुत्ता, हाथी, पीपल, नदी का धार्मिक महत्त्व इन अनन्त शाखावालों की देन है। यदि इनका कोई धार्मिक महत्त्व होता तो श्रीकृष्ण अवश्य कहते। हाँ, मन्दिर, मस्जिद इत्यादि पूजा के स्थल आरम्भिक काल में अवश्य हैं। वहाँ प्रेरणादायक सामूहिक उपदेश हैं तो उनकी उपयोगिता अवश्य है, वे धर्मोपदेश केन्द्र हैं। प्रस्तुत श्लोक में दो पण्डितों की चर्चा है। एक पण्डित तो वह है जो पूर्णज्ञाता है और दूसरा वह जो विद्या-विनयसम्पन्न है। वे दो कैसे? वस्तुतः प्रत्येक श्रेणी की दो सीमाएँ होती हैं- एक तो अधिकतम सीमा पराकाष्ठा और दूसरी प्रवेशिका अथवा निम्नतम सीमा। उदाहरण के लिये भक्ति की निम्नतम सीमा वह है जहाँ से भक्ति आरम्भ की जाती है; विवेक, वैराग्य और लगन के साथ जब आराधना करते हैं और अधिकतम सीमा वह है जहाँ भक्ति अपना परिणाम देने की स्थिति में होती है। ठीक इसी प्रकार ब्राह्मण-श्रेणी है। जब ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली क्षमताएँ आती हैं, उस समय विद्या होती है, विनय होता है। मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, अनुभवी सूत्रपात का संचार, धारावाही चिन्तन, ध्यान और समाधि इत्यादि ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली सारी योग्यताएँ उसके अन्तराल में स्वाभाविक कार्यरत रहती हैं। यह ब्राह्मणत्व की निम्नतम सीमा है। उच्चतम सीमा तब आती है, जब क्रमशः उन्नत होते-होते वह ब्रह्म का दिग्दर्शन करके उसमें विलय पा जाता है। जिसे जानना था, जान लिया। वह पूर्णज्ञाता है। अपुनरावृत्तिवाला ऐसा महापुरुष उस विद्या-विनयसम्पन्न

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१३८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता ब्राह्मण, चाण्डाल, कुत्ता, हाथी और गाय सब पर समान दृष्टिवाला होता है; क्योंकि उसकी दृष्टि हृदयस्थित आत्म-स्वरूप पर पड़ती है। ऐसे महापुरुष को परमगति में क्या मिला है और कैसे? इस पर प्रकाश डालते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं- इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः॥१९॥ उन पुरुषों द्वारा जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया, जिनका मन समत्व में स्थित है। मन के समत्व का संसार जीतने से क्या सम्बन्ध? संसार मिट ही गया, तो वह पुरुष रहा कहाँ? श्रीकृष्ण कहते हैं, 'निर्दोषं हि समं ब्रह्म'- वह ब्रह्म निर्दोष और सम है, इधर उसका मन भी निर्दोष और सम स्थितिवाला हो गया। 'तस्मात् ब्रह्मणि ते स्थिताः'- इसलिये वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है। इसी का नाम अपुनरावर्ती परमगति है। यह कब मिलती है? जब संसाररूपी शत्रु जीतने में आ जाय। संसार कब जीतने में आता है? जब मन का निरोध हो जाय, समत्व में प्रवेश पा जाय (क्योंकि मन का प्रसार ही जगत् है)। जब वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है तब ब्रह्मविद् का लक्षण क्या है? उसकी रहनी स्पष्ट करते हैं- न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्। स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥२०॥ उसका कोई प्रिय-अप्रिय होता नहीं। इसलिये जिसे लोग प्रिय समझते हैं, उसे पाकर वह हर्षित नहीं होता और जिसे लोग अप्रिय समझते हैं (जैसा धर्मावलम्बी चिह्न लगाते हैं), उसे पाकर वह उद्वेगवान् नहीं होता है। ऐसा स्थिरबुद्धि, 'असम्मूढः'- संशयरहित, 'ब्रह्मवित्'- ब्रह्म से संयुक्त ब्रह्मवेत्ता 'ब्रह्मणि स्थितः'- परात्पर ब्रह्म में सदैव स्थित है। बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्। स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥२१॥ बाहर संसार के विषय-भोगों में अनासक्त पुरुष अन्तरात्मा में स्थित जो सुख है, उस सुख को प्राप्त होता है। वह पुरुष 'ब्रह्मयोगयुक्तात्मा'- परब्रह्म