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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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चतुर्थ अध्याय १२१ का निरोध खेती करने से होता हो; व्यापार, नौकरी या राजनीति करने से होता हो तो आप करिये। यज्ञ तो ऐसी क्रिया है, जो पूर्ण होते ही तत्क्षण परब्रह्म में प्रवेश दिला देती है। बाह्य किसी भी कार्य से आप तत्क्षण ब्रह्म में प्रवेश पा जाते हों तो कीजिये। वस्तुतः यह सब-के-सब यज्ञ चिन्तन की अन्तःक्रियाएँ हैं, आराधना का चित्रण है, जिससे आराध्यदेव विदित होता है। यज्ञ उस आराध्य तक की दूरी तय करने की निर्धारित प्रक्रिया-विशेष है। यह यज्ञ श्वास-प्रश्वास, प्राणायाम इत्यादि जिस क्रिया से सम्पन्न होते हैं, उस कार्य-प्रणाली का नाम कर्म है। कर्म का शुद्ध अर्थ है- 'आराधना', 'चिन्तन'। प्रायः लोग कहते हैं कि संसार में कुछ भी किया जाय, हो गया कर्म। कामना से रहित होकर कुछ भी करते जाओ, हो गया निष्काम कर्मयोग। कोई कहता है कि अधिक लाभ के लिये विदेशी वस्त्र बेचते हैं तो आप सकामी हैं। देश-सेवा के लिये स्वदेशी बेचें तो हो गया निष्काम कर्मयोग। निष्ठापूर्वक नौकरी करें, हानि-लाभ की चिन्ता से मुक्त होकर व्यापार करें, हो गया निष्काम कर्मयोग। जय-पराजय की भावना से मुक्त हो युद्ध करें, चुनाव लड़ें, हो गये निष्कर्मी। मरोगे तो मुक्ति हो जायेगी। वस्तुतः ऐसा कुछ भी नहीं है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में बताया कि इस निष्काम कर्म में निर्धारित क्रिया एक ही है- 'व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।' अर्जुन! तू निर्धारित कर्म को कर। यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। यज्ञ क्या है? श्वास- प्रश्वास का हवन, इन्द्रियों का संयम, यज्ञस्वरूप महापुरुष का ध्यान, प्राणायाम- प्राणों का निरोध। यही मन की विजितावस्था है। मन का ही प्रसार जगत् है। श्रीकृष्ण के ही शब्दों में, 'इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।' (५/१९)- उन पुरुषों द्वारा चराचर जगत् यहीं जीत लिया गया, जिनका मन समत्व में स्थित है। भला मन के समत्व और जगत् के जीतने से क्या सम्बन्ध है? यदि जगत् को जीत ही लिया तो रुका कहाँ पर? तब कहते हैं- वह ब्रह्म निर्दोष और सम है, इधर मन भी निर्दोष और समत्व की स्थितिवाला हो गया, अतः वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है।