यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context१२२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता सारांशतः मन का प्रसार ही जगत् है। चराचर जगत् ही हवन-सामग्री के रूप में है। मन के सर्वथा निरोध होते ही जगत् का निरोध हो जाता है। मन के निरोध के साथ ही यज्ञ का परिणाम निकल आता है। यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है, उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला पुरुष सनातन ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाता है। यह सभी यज्ञ ब्रह्मस्थित महापुरुषों की वाणी द्वारा कहे गये हैं। ऐसा नहीं कि अलग-अलग सम्प्रदायों के साधक अलग-अलग प्रकार के यज्ञ करते हैं, बल्कि ये सभी यज्ञ एक ही साधक की ऊँची-नीची अवस्थाएँ हैं। यह यज्ञ जिससे होने लगे, उस क्रिया का नाम कर्म है। सम्पूर्ण गीता में एक भी श्लोक ऐसा नहीं है, जो सांसारिक कार्य-व्यापारों का समर्थन करता हो। प्रायः यज्ञ का नाम आने पर लोग बाहर एक यज्ञ-वेदी बनाकर तिल, जौ लेकर ‘स्वाहा’ बोलते हुए हवन प्रारम्भ कर देते हैं। यह एक धोखा है। द्रव्ययज्ञ दूसरा है, जिसे श्रीकृष्ण ने कई बार कहा। पशुबलि, वस्तु-दाह इत्यादि से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।।३३।। अर्जुन! सांसारिक द्रव्यों से सिद्ध होनेवाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ [जिसका परिणाम ज्ञान (साक्षात्कार) है, यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है उस अमृततत्त्व की जानकारी का नाम ज्ञान है, ऐसा यज्ञ] श्रेयस्कर है, परमकल्याणकारी है। हे पार्थ! सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में शेष हो जाते हैं, ‘परिसमाप्यते’- भली प्रकार समाहित हो जाते हैं। ज्ञान यज्ञ की पराकाष्ठा है। उसके पश्चात् कर्म किये जाने से न कोई लाभ है और न छोड़ देने से उस महापुरुष की कोई क्षति ही होती है। इस प्रकार भौतिक द्रव्यों से होनेवाले यज्ञ भी यज्ञ हैं; किन्तु उस यज्ञ की तुलना में, जिसका परिणाम साक्षात्कार है, उस ज्ञानयज्ञ की अपेक्षा अत्यन्त अल्प हैं। आप करोड़ों का हवन करें, सैकड़ों यज्ञवेदी बना लें, सत्पथ पर द्रव्य लगावें, साधु-सन्त-महापुरुषों की सेवा में द्रव्य लगावें; किन्तु इस ज्ञानयज्ञ की अपेक्षा अत्यन्त अल्प हैं। वस्तुतः यज्ञ श्वास-प्रश्वास का है, इन्द्रियों के संयम