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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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१४० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता जो अन्तरात्मा में ही सुखवाला, ‘अन्तरारामः’- अन्तरात्मा में ही आरामवाला तथा जो अन्तरात्मा में ही प्रकाशवाला (साक्षात्कारवाला) है, वही योगी ‘ब्रह्मभूतः’- ब्रह्म के साथ एक होकर ‘ब्रह्मनिर्वाणम्’- वाणी से परे ब्रह्म, शाश्वत ब्रह्म को प्राप्त होता है। अर्थात् पहले विकारों (काम-क्रोध) का अन्त, फिर दर्शन, फिर प्रवेश। आगे देखें- लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।२५।। परमात्मा का साक्षात्कार करके जिनका पाप नष्ट हो गया है, जिनकी दुविधाएँ नष्ट हो गयी हैं, सम्पूर्ण प्राणियों के हित में जो लगे हुए हैं (प्राप्तिवाले ही ऐसा कर सकते हैं। जो स्वयं गड्ढे में पड़ा है, वह दूसरों को क्या बाहर निकालेगा? इसीलिये करुणा महापुरुष का स्वाभाविक गुण हो जाता है) तथा ‘यतात्मानः’- जितेन्द्रिय ब्रह्मवेत्ता पुरुष शान्त परब्रह्म को प्राप्त होते हैं। उसी महापुरुष की स्थिति पर पुनः प्रकाश डालते हैं- कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्। अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्।।२६।। काम और क्रोध से रहित, जीते हुए चित्तवाले, परमात्मा का साक्षात्कार किये हुए ज्ञानी पुरुषों के लिये सब ओर से शान्त परब्रह्म ही प्राप्त है। बार-बार योगेश्वर श्रीकृष्ण उस पुरुष की रहनी पर बल दे रहे हैं, जिससे प्रेरणा मिले। प्रश्न लगभग पूर्ण हुआ। अब वे पुनः बल देते हैं कि इस स्थिति को प्राप्त करने का आवश्यक अंग ‘श्वास-प्रश्वास का चिन्तन’ है। यज्ञ की प्रक्रिया में प्राण में अपान का हवन, अपान में प्राण का हवन, प्राण और अपान दोनों की गति का निरोध उन्होंने बताया है, उसी को समझा रहे हैं- स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः। प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ।।२७।। यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः।।२८।। अर्जुन! बाहर के विषयों, दृश्यों का चिन्तन न करते हुए, उन्हें त्यागकर, नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थिर करके, ‘भ्रुवोः अन्तरे’ का ऐसा अर्थ