यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextपञ्चम अध्याय १४१ नहीं कि आँखों के बीच या भौंह के बीच कहीं देखने की भावना से दृष्टि लगायें। भृकुटी के बीच का शुद्ध अर्थ इतना ही है कि सीधे बैठने पर दृष्टि भृकुटी के ठीक मध्य से सीधे आगे पड़े। दाहिने-बायें, इधर-उधर चकपक न देखें। नाक की डाँड़ी पर सीधी दृष्टि रखते हुए (कहीं नाक ही न देखने लगें) नासिका के अन्दर विचरण करनेवाले प्राण और अपान वायु को सम करके अर्थात् दृष्टि तो वहाँ स्थिर करें और सुरत को श्वास में लगा दें कि कब श्वास भीतर गयी? कितना रुकी? (लगभग आधा सेकण्ड रुकती है, प्रयास करके न रोकें।) कब श्वास बाहर निकली? कितनी देर तक बाहर रही? कहने की आवश्यकता नहीं कि श्वास में उठनेवाली नामध्वनि सुनायी पड़ती रहेगी। इस प्रकार श्वास-प्रश्वास पर जब सुरत टिक जायेगी तो धीरे-धीरे श्वास अचल, स्थिर ठहर जायेगी, सम हो जायेगी। न भीतर से संकल्प उठेंगे और न बाह्य संकल्प अन्दर टकराव कर पायेंगे। बाहर के भोगों का चिन्तन तो बाहर ही त्याग दिया गया था, भीतर भी संकल्प नहीं जाग्रत होंगे। सुरत एकदम खड़ी हो जाती है तैलधारावत्। तेल की धारा पानी की तरह टप-टप नहीं गिरती, जब तक गिरेगी धारा ही गिरेगी। इसी प्रकार प्राण और अपान की गति एकदम सम, स्थिर करके इन्द्रियों, मन और बुद्धि को जिसने जीत लिया है; इच्छा, भय और क्रोध से रहित, मननशीलता की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ मोक्षपरायण मुनि सदा ‘मुक्त’ ही है। मुक्त होकर वह कहाँ जाता है? क्या पाता है? इस पर कहते हैं- भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।।२९।। वह मुक्त पुरुष मुझे यज्ञ और तपों का भोगनेवाला, सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर, सम्पूर्ण प्राणियों का स्वार्थरहित हितैषी, ऐसा साक्षात् जानकर शान्ति को प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि- उस पुरुष के श्वास- प्रश्वास के यज्ञ और तप का भोक्ता मैं हूँ। यज्ञ और तप अन्त में जिसमें विलय होते हैं, वह मैं हूँ। वह मुझे प्राप्त होता है। यज्ञ के अन्त में जिसका नाम शान्ति है, वह मेरा ही स्वरूप है। वह मुक्त पुरुष मुझे जानता है और जानते ही मुझे प्राप्त हो जाता है। इसी का नाम शान्ति है। जैसे मैं ईश्वरों का भी ईश्वर हूँ, वैसे ही वह भी है।