BharatKosha
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

Page 236 of 429

Read in context
Page 236

नवम अध्याय २०१ सदैव मुझसे संयुक्त होकर अनन्य भक्ति से मुझे उपासते हैं। अविरल लगे रहते हैं। कौन-सी उपासना करते हैं? कैसा है यह कीर्तिगान? कोई दूसरी उपासना नहीं वरन् वही 'यज्ञ', जिसे विस्तार से बता आये हैं। उसी आराधना को यहाँ संक्षेप में योगेश्वर श्रीकृष्ण दोहरा रहे हैं- ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥१५॥ उनमें से कोई तो मुझ सर्वव्याप्त विराट् परमात्मा को ज्ञानयज्ञ द्वारा यजन करते हैं अर्थात् अपनी हानि, लाभ और शक्ति को समझकर इसी नियत कर्म यज्ञ में प्रवृत्त होते हैं, कुछ एकत्व भाव से मेरी उपासना करते हैं कि मुझे इसी में एक होना है और दूसरे सब कुछ मुझे अलग रखकर, मुझे समर्पण करके निष्काम सेवा-भाव से मुझे उपासते हैं तथा बहुत प्रकार से उपासते हैं; क्योंकि एक ही यज्ञ के ये सभी ऊँचे-नीचे स्तर हैं। यज्ञ का आरम्भ सेवा से ही होता है; किन्तु उसका अनुष्ठान होता कैसे है? योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- यज्ञ मैं करता हूँ। यदि महापुरुष रथी न हो तो यज्ञ पार नहीं लगेगा। उन्हीं के निर्देशन में साधक समझ पाता है कि अब वह किस स्तर पर है, कहाँ तक पहुँच सका है। वस्तुतः यज्ञकर्त्ता कौन है?- इस पर योगेश्वर कहते हैं- अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्। मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥१६॥ कर्त्ता मैं हूँ। वस्तुतः कर्त्ता के पीछे प्रेरक के रूप में सदैव संचालित करनेवाला इष्ट ही है। कर्त्ता द्वारा जो पार लगता है, मेरी देन है। यज्ञ मैं हूँ। यज्ञ आराधना की विधि-विशेष है। पूर्तिकाल में यज्ञ जिसका सृजन करता है, उस अमृत को पान करनेवाला पुरुष सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है। स्वधा मैं हूँ अर्थात् अतीत के अनन्त संस्कारों को विलय करना, उन्हें तृप्त कर देना मेरी देन है। भवरोग को मिटानेवाली औषधि मैं हूँ। मुझे पाकर लोग इस रोग से निवृत्त हो जाते हैं। मन्त्र मैं हूँ। मन को श्वास के अन्तराल में निरोध करना मेरी देन है। इस निरोध-क्रिया में तीव्रता लानेवाली वस्तु 'आज्य' (हवि) भी मैं हूँ। मेरे ही प्रकाश में मन की सभी प्रवृत्तियाँ विलीन होती हैं। हवन अर्थात् समर्पण भी मैं ही हूँ।

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द) · Page 236 of 429 · BharatKosha