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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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२०२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण बार-बार 'मैं हूँ' कह रहे हैं। इसका आशय मात्र इतना ही है कि मैं ही प्रेरक के रूप में आत्मा से अभिन्न होकर खड़ा हो जाता हूँ तथा निरन्तर निर्णय देते हुए योगक्रिया को पूर्ण कराता हूँ। इसी का नाम विज्ञान है। 'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे कि “जब तक इष्टदेव रथी होकर श्वास-प्रश्वास पर रोकथाम न करने लगें, तब तक भजन आरम्भ ही नहीं होता।” कोई लाख आँख मूँदे, भजन करे, शरीर को तपा डाले; लेकिन जब तक जिस परमात्मा की हमें चाह है वह, जिस सतह पर हम खड़े हैं उस स्तर पर उतरकर आत्मा से अभिन्न होकर जागृत नहीं हो जाता, तब तक सही मात्रा में भजन का स्वरूप समझ में नहीं आता। इसलिये महाराज जी कहते थे- “मेरे स्वरूप को पकड़ो, मैं सब दूँगा।” श्रीकृष्ण कहते हैं- सब मुझसे होता है। पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च।।१७।। अर्जुन! मैं ही सम्पूर्ण जगत् का 'धाता' अर्थात् धारण करनेवाला, 'पिता' अर्थात् पालन करनेवाला, 'माता' अर्थात् उत्पन्न करनेवाला, 'पितामहः' अर्थात् मूल उद्गम हूँ, जिसमें सभी प्रवेश पाते हैं और जानने योग्य पवित्र ओंकार अर्थात् 'अहं आकार इति ओंकारः'- वह परमात्मा मेरे स्वरूप में है। 'सोऽहं, तत्त्वमसि' इत्यादि एक दूसरे के पर्याय हैं, ऐसा जानने योग्य स्वरूप मैं ही हूँ। 'ऋक्' अर्थात् सम्पूर्ण प्रार्थना, 'साम' अर्थात् समत्व दिलानेवाली प्रक्रिया, 'यजुः' अर्थात् यजन की विधि-विशेष भी मैं ही हूँ। योग-अनुष्ठान के उक्त तीनों आवश्यक अंग मुझसे होते हैं। गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।।१८।। हे अर्जुन! 'गतिः' अर्थात् प्राप्त होने योग्य परमगति, 'भर्ता'- भरण- पोषण करनेवाला, सबका स्वामी, 'साक्षी' अर्थात् द्रष्टा-रूप में स्थित सबको जाननेवाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, अकारण प्रेमी मित्र, उत्पत्ति और प्रलय अर्थात् शुभाशुभ संस्कारों का विलय तथा अविनाशी कारण मैं ही हूँ। अर्थात् अन्त में जिनमें प्रवेश मिलता है, वे सारी विभूतियाँ मैं ही हूँ।