यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextदशम अध्याय २२१ विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन। भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥१८॥ हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति को और योग की विभूति को फिर भी विस्तारपूर्वक कहिये। संक्षेप में तो इसी अध्याय के आरम्भ में कहा ही है पुनः कहिये; क्योंकि अमृत-तत्त्व को दिलानेवाले इन वचनों को सुनने से मेरी तृप्ति नहीं होती। रामचरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं।। (रामचरितमानस, ७/५२/१) जब तक प्रवेश नहीं मिल जाता तब तक उस अमृत-तत्त्व को जानने की पिपासा बनी रहती है। प्रवेश से पूर्व रास्ते में ही यह सोचकर कोई बैठ गया कि बहुत जान लिया तो उसने नहीं जाना। सिद्ध है कि उसका मार्ग अवरुद्ध होना चाहता है। इसलिये साधक को पूर्तिपर्यन्त इष्ट के निर्देशन को पकड़ते रहना चाहिये और उसे आचरण में ढालना चाहिये। अर्जुन की उक्त जिज्ञासा पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- श्रीभगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः। प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे।।१९।। कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! अब मैं अपनी दिव्य विभूतियों को, उनमें से प्रमुख विभूतियों को तुझसे कहूँगा; क्योंकि मेरी विभूतियों के विस्तार का अन्त नहीं है। अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।।२०।। अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ अर्थात् जन्म, मृत्यु और जीवन भी मैं ही हूँ।