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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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२२२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्। मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥२१॥ मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियों में प्रकाशमान सूर्य हूँ। वायु के भेदों में मैं मरीचि नामक वायु और नक्षत्रों में चन्द्रमा हूँ। वेदानां सामवेदोऽस्मि देवाना मस्मि वासवः। इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥२२॥ वेदों में मैं सामवेद अर्थात् पूर्ण समत्व दिलानेवाला गायन हूँ। देवों में मैं उनका अधिपति इन्द्र हूँ और इन्द्रियों में मन हूँ; क्योंकि मन के निग्रह से ही मैं जाना जाता हूँ तथा प्राणियों में मैं उनकी चेतना हूँ। रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्। वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥२३॥ एकादश रुद्रों में मैं शंकर हूँ। शङ्क अरः स शंकरः अर्थात् शंकाओं से उपराम