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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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२४४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता क्या श्रीकृष्ण फिर भी वही राज्य देंगे? नहीं, वस्तुतः विकारों के अन्त के साथ परमात्मस्वरूप की स्थिति ही वास्तविक समृद्धि है, जो स्थिर सम्पत्ति है। जिसका कभी विनाश नहीं होता, राजयोग का परिणाम है। द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्। मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्।।३४।। इन द्रोण, भीष्म, जयद्रथ और कर्ण तथा अन्यान्य बहुत से मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर योद्धाओं को तू मार। भय मत कर। संग्राम में बैरियों को तू निश्चित जीतेगा, इसलिये युद्ध कर। यहाँ भी योगेश्वर ने कहा कि ये मेरे द्वारा मारे हुए हैं, इन मरे हुए को तू मार। स्पष्ट किया कि मैं कर्त्ता हूँ, जबकि पाँचवें अध्याय के १३, १४ एवं १५वें श्लोक में उन्होंने कहा- भगवान अकर्त्ता हैं। अठारहवें अध्याय में वे कहते हैं कि शुभ अथवा अशुभ प्रत्येक कार्य के होने में पाँच माध्यम हैं- अधिष्ठान, कर्त्ता, करण, चेष्टा और दैव। जो कहते हैं कि कैवल्यस्वरूप परमात्मा करते हैं वे अविवेकी हैं, यथार्थ नहीं जानते अर्थात् भगवान नहीं करते। ऐसा विरोधाभास क्यों? वस्तुतः प्रकृति और उस परमात्मपुरुष के बीच एक सीमा-रेखा है। जब तक प्रकृति के परमाणुओं का दबाव अधिक रहता है, तब तक माया प्रेरणा देती है और जब साधक उससे ऊपर उठ जाता है- ईश्वर, इष्ट अथवा सद्गुरु के कार्यक्षेत्र में प्रवेश प्राप्त कर लेता है, उसके बाद सद्गुरु इष्ट (याद रहे प्रेरक के स्थान पर सद्गुरु, परमात्मा, इष्ट, भगवान पर्यायवाची हैं। कुछ भी कहें, कहता भगवान ही है।) हृदय से रथी हो जाता है, आत्मा से जाग्रत होकर उस अनुरागी साधक का स्वयं पथ-संचालन करने लग जाता है। 'पूज्य महाराज जी' कहते थे- “हो, जिस परमात्मा की हमें चाह है, जिस सतह पर हम खड़े हैं उस सतह पर स्वयं उतरकर जब तक आत्मा से जागृत नहीं हो जाता, तब तक सही मात्रा में साधन का आरम्भ नहीं होता। उसके बाद जो कुछ साधक से पार लगता है, वह उसकी देन है। साधक तो निमित्तमात्र