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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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एकादश अध्याय २४५ होकर उसके संकेत और आदेश पर चलता भर रहता है। साधक की विजय उसकी देन है। ऐसे अनुरागी के लिये ईश्वर अपनी दृष्टि से देखता है, दिखाता है और अपने स्वरूप तक पहुँचाता है।” यही श्रीकृष्ण कहते हैं कि मेरे द्वारा मारे हुए इन बैरियों को मार। निश्चय ही तुम्हारी विजय होगी, मैं जो खड़ा हूँ। सञ्जय उवाच एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी। नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य।।३५।। संजय बोला- (जो कुछ अर्जुन ने देखा, ठीक वैसा ही संजय ने देखा है। अज्ञान से आच्छादित मन ही अन्धा धृतराष्ट्र है; लेकिन ऐसा मन भी संयम के माध्यम से भली प्रकार देखता, सुनता और समझता है) केशव के इन (उपर्युक्त) वचनों को सुनकर किरीटधारी अर्जुन भयभीत होकर काँपता हुआ हाथ जोड़कर नमस्कार करके, फिर श्रीकृष्ण से इस प्रकार गद्गद वाणी में बोला- अर्जुन उवाच स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च। रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः।।३६।। हे हृषीकेश ! यह उचित ही है कि आपकी कीर्ति से संसार हर्षित होता है और अनुराग को प्राप्त होता है। आपकी ही महिमा से भयभीत हुए राक्षस दिशाओं में भागते हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय आपकी महिमा को देखकर नमस्कार करते हैं। कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्।।३७।।