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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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चतुर्दश अध्याय २८५ लेते और प्रलयकाल में अर्थात् शरीरान्त होते समय व्याकुल नहीं होते; क्योंकि महापुरुष के शरीर का अन्त तो उसी दिन हो जाता है, जब वह स्वरूप को प्राप्त होता है। उसके बाद उसका शरीर रहने का एक मकान मात्र रह जाता है। पुनर्जन्म का स्थान कहाँ है, जहाँ लोग जन्म लेते हैं? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्। सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥३॥ हे अर्जुन! मेरी 'महद्ब्रह्म' अर्थात् अष्टधा मूल प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है और उसमें मैं चेतनरूपी बीज को स्थापित करता हूँ। उस जड़-चेतन के संयोग से सभी भूतों की उत्पत्ति होती है। सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥४॥ कौन्तेय! सब योनियों में जितने शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी 'योनि:'- गर्भधारण करनेवाली माता आठ भेदोंवाली मूल प्रकृति है और मैं ही बीज का स्थापन करनेवाला पिता हूँ। अन्य कोई न माता है, न पिता। जब तक जड़- चेतन का संयोग रहेगा, जन्म होते रहेंगे; निमित्त तो कोई-न-कोई बनता ही रहेगा। चेतन आत्मा जड़ प्रकृति में क्यों बँध जाती है? इस पर कहते हैं- सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः। निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५॥ महाबाहु अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण प्रकृति से उत्पन्न हुए तीनों गुण ही इस अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं। किस प्रकार?- तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्। सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥६॥ निष्पाप अर्जुन! उन तीनों गुणों में प्रकाश करनेवाला निर्विकार सत्त्वगुण तो 'निर्मलत्वात्'- निर्मल होने के कारण सुख और ज्ञान की आसक्ति से

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