यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context२८६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता आत्मा को शरीर में बाँधता है। सत्त्वगुण भी बन्धन ही है। अन्तर इतना ही है कि सुख एकमात्र परमात्मा में है और ज्ञान साक्षात्कार का नाम है। सत्त्वगुणी तब तक बँधा है, जब तक परमात्मा का साक्षात्कार नहीं हो जाता। रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्। तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ।।७।। हे अर्जुन ! राग का जीता-जागता स्वरूप रजोगुण है। उसे तू 'कर्मसङ्गेन'- कामना और आसक्ति से उत्पन्न हुआ जान। वह जीवात्मा को कर्म और उसके फल की आसक्ति में बाँधता है। वह कर्म में प्रवृत्ति देता है। तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्। प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ।।८।। अर्जुन ! समस्त देहधारियों को मोहनेवाले तमोगुण को तू अज्ञान से उत्पन्न हुआ जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद अर्थात् व्यर्थ की चेष्टा, आलस्य (कि कल करेंगे) और निद्रा के द्वारा बाँधता है। निद्रा का अर्थ यह नहीं है कि तमोगुणी अधिक सोता है। शरीर सोता हो ऐसी बात नहीं। 'या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।' जगत् ही रात्रि है। तमोगुणी व्यक्ति इस जगत्रूपी निशा में रात-दिन व्यस्त रहता है, प्रकाश स्वरूप की ओर अचेत रहता है। यही तमोगुणी निद्रा है। जो इसमें फँसा है, सोता है। अब तीनों गुणों के बन्धन का सामूहिक स्वरूप बताते हैं- सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत। ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ।।९।। अर्जुन ! सत्त्वगुण सुख में लगाता है, शाश्वत परमसुख की धारा में लगाता है, रजोगुण कर्म में प्रवृत्त करता है और तमोगुण ज्ञान को आच्छादित करके प्रमाद में अर्थात् अन्तःकरण की व्यर्थ चेष्टाओं में लगाता है। जब गुण एक ही स्थान पर एक ही हृदय में हैं तो अलग-अलग कैसे विभक्त हो जाते हैं? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं-