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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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२९२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता वे जन्म नहीं लेते; किन्तु शरीर का निधन तो होना ही है, उस समय वे व्यथित नहीं होते। वे वास्तव में शरीर तो उसी दिन त्याग देते हैं, जिस दिन स्वरूप को प्राप्त होते हैं। प्राप्ति जीते-जी होती है, किन्तु शरीर का अन्त होते समय भी वे व्यथित नहीं होते। प्रकृति से ही उत्पन्न हुए रज, सत्त्व और तम तीनों गुण ही इस जीवात्मा को शरीरों में बाँधते हैं। दो गुणों को दबाकर तीसरा गुण बढ़ाया जा सकता है। गुण परिवर्तनशील हैं। प्रकृति, जो अनादि है, नष्ट नहीं होती; बल्कि गुणों का प्रभाव टाला जा सकता है। गुण मन पर प्रभाव डालते हैं। जब सत्त्वगुण की वृद्धि रहती है तो ईश्वरीय प्रकाश और बोधशक्ति रहती है। रजोगुण रागात्मक है। उस समय कर्म का लोभ रहता है, आसक्ति रहती है और अन्तःकरण में तमोगुण कार्यरूप लेने पर आलस्य-प्रमाद घेर लेता है। सत्त्व की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त पुरुष ऊपर के निर्मल लोकों में जन्म लेता है। रजोगुण की वृद्धि को प्राप्त हुआ मनुष्य मानवयोनि में ही लौटकर आता है और तमोगुण की वृद्धिकाल में मनुष्य शरीर त्यागकर अधम (पशु, कीट, पतंग इत्यादि) योनि को प्राप्त होता है। इसलिये मनुष्यों को क्रमशः उन्नत गुण सात्त्विक की ओर ही बढ़ना चाहिये। वस्तुतः तीनों गुण किसी-न-किसी योनि के ही कारण हैं। गुण ही आत्मा को शरीरों में बाँधते हैं, इसलिये गुणों से अतीत होना चाहिये। वे जिससे मुक्त होते हैं, उसका स्वरूप बताते हुए योगेश्वर ने कहा- अष्टधा मूल प्रकृति गर्भ को धारण करनेवाली माता है और मैं ही बीजरूप पिता हूँ। अन्य न कोई माता है, न पिता। जब तक यह क्रम रहेगा, तब तक चराचर जगत् में निमित्त रूप से कोई-न-कोई माता-पिता बनते रहेंगे; किन्तु वस्तुतः प्रकृति ही माता है, मैं ही पिता हूँ। अर्जुन ने तीन प्रश्न किये- गुणातीत पुरुष के क्या लक्षण हैं? क्या आचरण हैं? और किस उपाय से मनुष्य इन तीनों गुणों से अतीत होता है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गुणातीत पुरुष के लक्षण और आचरण बताये और अन्त में गुणातीत होने का उपाय बताया कि जो पुरुष अव्यभिचारिणी भक्ति

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