BharatKosha
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

Page 328 of 429

Read in context
Page 328

चतुर्दश अध्याय २९३ और योग के द्वारा निरन्तर मुझे भजता है, वह तीनों गुणों से अतीत हो जाता है। अन्य किसी का चिन्तन न करते हुए निरन्तर इष्ट का चिन्तन करना अव्यभिचारिणी भक्ति है। जो संसार के संयोग-वियोग से सर्वथा रहित है, उसी का नाम योग है। उसको कार्यरूप देने की प्रणाली का नाम कर्म है। यज्ञ जिससे सम्पन्न होता है, वह हरकत कर्म है। अव्यभिचारिणी भक्ति द्वारा उस नियत कर्म के आचरण से ही पुरुष तीनों गुणों से अतीत होता है और अतीत होकर ब्रह्म के साथ एकीभाव के लिये, पूर्ण कल्प को प्राप्त होने के लिये योग्य होता है। गुण जिस मन पर प्रभाव डालते हैं, उसके विलय होते ही ब्रह्म के साथ एकीभाव हो जाता है, यही वास्तविक कल्प है। अतः बिना भजन किये कोई गुणों से अतीत नहीं होता। अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण निर्णय देते हैं- वह गुणातीत पुरुष जिस ब्रह्म के साथ एकीभाव में स्थित होता है उस ब्रह्म का, अमृत-तत्त्व का, शाश्वत- धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का मैं ही आश्रय हूँ अर्थात् प्रधान कर्त्ता हूँ। अब तो श्रीकृष्ण चले गये, अब वह आश्रय तो चला गया, तब तो बड़े संशय की बात है। वह आश्रय अब कहाँ मिलेगा? लेकिन नहीं, श्रीकृष्ण ने अपना परिचय दिया है कि वे एक योगी थे, स्वरूपस्थ महापुरुष थे। ‘शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।’ अर्जुन ने कहा- मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण हूँ, मुझे संभालिये। स्थान-स्थान पर श्रीकृष्ण ने अपना परिचय दिया, स्थितप्रज्ञ महापुरुष के लक्षण बताये और उनसे अपनी तुलना की। अतः स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण एक महात्मा, योगी थे। अब यदि आपको अखण्ड एकरस आनन्द, शाश्वत-धर्म अथवा अमृत-तत्त्व की आवश्यकता है तो इन सबकी प्राप्ति के स्रोत एकमात्र सद्गुरु हैं। सीधे पुस्तक पढ़कर इसे कोई नहीं पा सकता। जब वही महापुरुष आत्मा से अभिन्न होकर रथी हो जाते हैं, तो शनैः-शनैः अनुरागी को संचालित करते हुए उसके स्वरूप तक, जिनमें वे स्वयं प्रतिष्ठित हैं, पहुँचा देते हैं। वही एकमात्र माध्यम हैं। इस प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने को सबका आश्रय बताते हुए इस चौदहवें अध्याय का समापन किया, जिसमें गुणों का विस्तार से वर्णन है। अतः-