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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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३०० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता किया, जिनमें सबका परिणाम ज्ञान है। ज्ञान ही अग्नि है। श्रीकृष्ण कहते हैं, ऐसा अग्निस্বরূপ होकर प्राण और अपान से युक्त चार विधियों से (जप सदैव श्वास-प्रश्वास से होता है, उसकी चार विधियाँ बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा हैं-इन चार विधियों से) तैयार होनेवाले अन्न को मैं ही पचाता हूँ। श्रीकृष्ण के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र अन्न है, जिससे आत्मा पूर्ण तृप्त हो जाता है फिर कभी अतृप्त नहीं होता। शरीर के पोषक प्रचलित अन्नों को योगेश्वर ने आहार की संज्ञा दी है (युक्ताहार...)। वास्तविक अन्न परमात्मा है। बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा की चार विधियों से निकलकर ही वह अन्न परिपक्व होता है। इसी को अनेक महापुरुषों ने नाम, रूप, लीला और धाम कहा है। पहले नाम का जप होता है, क्रमशः हृदय-देश में इष्ट का स्वरूप प्रकट होने लगता है, तत्पश्चात् उसकी लीला का बोध होने लगता है कि वह ईश्वर किस प्रकार कण-कण में व्याप्त है? किस प्रकार वह सर्वत्र कार्य करता है? इस प्रकार हृदय-देश में क्रियाकलापों का दर्शन ही लीला है (बाहर की रामलीला-रासलीला नहीं) और उस ईश्वरीय लीला की प्रत्यक्ष अनुभूति करते हुए जब मूललीलाधारी का स्पर्श मिलता है, तब धाम की स्थिति आती है। उसे जानकर साधक उसी में प्रतिष्ठित हो जाता है। उसमें प्रतिष्ठित होना और परावाणी की परिपक्वावस्था में परब्रह्म का स्पर्श कर उसमें स्थित होना दोनों साथ-साथ होता है। इस प्रकार प्राण और अपान अर्थात् श्वास और प्रश्वास से युक्त होकर चार विधियों से अर्थात् बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और क्रमशः उत्थान होते- होते परा की पूर्तिकाल में वह 'अन्न' - ब्रह्म परिपक्व हो जाता है, मिल भी जाता है, पच भी जाता है और पात्र भी परिपक्व ही है। सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च। वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥१५॥ मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ। मुझसे ही स्वरूप की स्मृति (सुरति, जो तत्त्व परमात्मा विस्मृत है उसका स्मरण हो

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