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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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पञ्चदश अध्याय ३०१ आना) होती है। (प्राप्तिकाल का चित्रण है) स्मृति के साथ ही ज्ञान (साक्षात्कार) और 'अपोहन' अर्थात् बाधाओं का शमन मुझ इष्ट से ही होता है। सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ। वेदान्त का कर्त्ता अर्थात् 'वेदस्य अन्तः सः वेदान्त' (अलग था तभी तो जानकारी हुई। जब जानते ही उसी स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गया, तो कौन किसको जाने?) वेद की अन्तिम स्थिति का कर्त्ता मैं ही हूँ और 'वेदवित्' अर्थात् वेद का ज्ञाता भी मैं ही हूँ। अध्याय के आरम्भ में उन्होंने कहा है कि संसार वृक्ष है। ऊपर परमात्मा मूल और नीचे प्रकृतिपर्यन्त शाखाएँ हैं। जो इसे मूल से प्रकृति का विभाजन करके जानता है, मूल से जानता है वह वेदवित् है। यहाँ कहते हैं कि मैं वेदवित् हूँ। उसे जो जानता है, श्रीकृष्ण ने अपने को उसकी तुलना में खड़ा किया कि वह वेदवित् है, मैं वेदवित् हूँ। श्रीकृष्ण भी एक तत्त्वज्ञ महापुरुष, योगियों के भी परमयोगी थे। यहाँ यह प्रश्न पूरा हुआ। अब बताते हैं कि संसार में पुरुष का स्वरूप दो प्रकार का है- द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।।१६।। अर्जुन ! इस संसार में 'क्षर'- क्षय होनेवाले, परिवर्तनशील और 'अक्षर'- अक्षय, अपरिवर्तनशील ऐसे दो प्रकार के पुरुष हैं। उनमें सम्पूर्ण भूतों (प्राणियों) के शरीर तो नाशवान् हैं, क्षर पुरुष हैं, आज हैं तो कल नहीं रह जायेंगे और दूसरा कूटस्थ पुरुष अविनाशी कहा जाता है। साधन के द्वारा मनसहित इन्द्रियों का निरोध अर्थात् जिसकी इन्द्रिय-समूह कूटस्थ है, वही अक्षर कहलाता है। अब आप स्त्री कहलाते हों अथवा पुरुष, यदि शरीर और शरीर-जन्म के कारण संस्कारों का क्रम लगा है तो आप क्षर पुरुष हैं और जब मनसहित इन्द्रियाँ कूटस्थ हो जाती हैं तब वही अक्षर पुरुष कहलाता है। किन्तु यह भी पुरुष की अवस्था-विशेष ही है। इन दोनों से भी परे एक अन्य पुरुष भी है- उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः।।१७।। उन दोनों से अति उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है और अविनाशी, परमात्मा, ईश्वर ऐसे कहा गया है। परमात्मा, अव्यक्त, अविनाशी, पुरुषोत्तम इत्यादि उसके परिचायक