यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextपञ्चदश अध्याय ३०३ यही विशेषता प्राप्तिवाले प्रत्येक महापुरुष में पायी गयी। रामकृष्ण परमहंसदेव एक बार बहुत प्रसन्न थे। भक्तों ने पूछा- “आज तो आप बहुत प्रसन्न हैं।” वे बोले- “आज मैं ‘वह’ परमहंस हो गया।” उनके समकालीन कोई अच्छे महापुरुष परमहंस थे, उनकी ओर संकेत किया। कुछ देर बाद वे मन-क्रम-वचन से विरक्ति की आशा से अपने पीछे लगे साधकों से बोले- “देखो, अब तुम लोग सन्देह न करना। मैं वही राम हूँ जो त्रेता में हुए थे, वही कृष्ण हूँ जो द्वापर में हुए थे। मैं उन्हीं की पवित्र आत्मा हूँ, वही स्वरूप हूँ। यदि पाना है तो मुझे देखो।” ठीक इसी प्रकार ‘पूज्य गुरु महाराज’ भी सबके सामने कहा करते थे- “हो, हम भगवान के दूत हैं। जे सचहूँ का सन्त है, वह भगवान का दूत है। हमारे द्वारा ही उनका सन्देशा मिलता है।” ईसा ने कहा- “मैं भगवान का पुत्र हूँ, मेरे पास आओ- इसलिये कि ईश्वर का पुत्र कहलाओगे।” अतः सभी पुत्र हो सकते हैं। हाँ, यह बात अलग है कि पास आने का तात्पर्य उन तक की साधना साधन-क्रम में चलकर पूरी करना है। मुहम्मद साहब ने कहा- “मैं अल्लाह का रसूल हूँ, सन्देशवाहक हूँ।” ‘पूज्य महाराज जी’ सबसे तो इतना ही कहते थे- न किसी विचार का खण्डन, न मण्डन। किन्तु जो विरक्ति में पीछे लगे थे, उनसे कहते थे- “केवल मेरे स्वरूप को देखो। यदि तुम्हें उस परमतत्त्व की चाह है तो मुझे देखो, सन्देह मत करो।” बहुतों ने सन्देह किया तो उनको अनुभव में दिखाकर, डाँट-फटकारकर, उन बाह्य विचारों से हटाकर, जिनमें योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार (अध्याय २/४०-४३) अनन्त पूजा-पद्धतियाँ हैं, अपने स्वरूप में लगाया। वे अद्यावधि महापुरुष के रूप में अवस्थित हैं। इसी प्रकार श्रीकृष्ण की अपनी स्थिति गोपनीय तो थी; किन्तु अपने अनन्य भक्त पूर्ण अधिकारी अनुरागी अर्जुन के प्रति उन्होंने उसे प्रकाशित किया। हर भक्त के लिये सम्भव है, महापुरुष लाखों को उस रास्ते पर चला देते हैं। निष्कर्ष- इस अध्याय के आरम्भ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि संसार एक वृक्ष है, पीपल-जैसा वृक्ष है। पीपल एक उदाहरण मात्र है। ऊपर इसका मूल परमात्मा और नीचे प्रकृतिपर्यन्त इसकी शाखा-प्रशाखाएँ हैं। जो इस वृक्ष को