यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
Page 339 of 429
Read in context३०४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता मूलसहित विदित कर लेता है, वह वेदों का ज्ञाता है। इस संसार-वृक्ष की शाखाएँ ऊपर और नीचे सर्वत्र व्याप्त हैं और 'मूलानि'- उसकी जड़ों का जाल भी ऊपर और नीचे सर्वत्र व्याप्त है, क्योंकि वह मूल ईश्वर है और वही बीजरूप से प्रत्येक जीव-हृदय में निवास करता है। पौराणिक आख्यान है कि एक बार कमल के आसन पर बैठे हुए ब्रह्माजी ने विचार किया कि मेरा उद्गम क्या है? जहाँ से वे पैदा हुए थे, उस कमल-नाल में प्रवेश करते चले गये। अनवरत चलते रहे; किन्तु अपना उद्गम न देख सके। तब हताश होकर वे उसी कमल के आसन पर बैठ गये। चित्त का निरोध करने में लग गये और ध्यान के द्वारा उन्होंने अपना मूल उद्गम पा लिया, परमतत्त्व का साक्षात्कार किया, स्तुति की। परमस्वरूप से ही आदेश मिला कि- मैं हूँ तो सर्वत्र; किन्तु मेरी प्राप्ति का स्थान मात्र हृदय है। हृदय-देश में जो ध्यान करता है, वह मुझे प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मा एक प्रतीक है। योग-साधना की एक परिपक्व अवस्था में इस स्थिति की जागृति है। ईश्वर की ओर उन्मुख ब्रह्मविद्या से संयुक्त बुद्धि ही ब्रह्मा है। कमल पानी में रहते हुए भी निर्मल और निर्लेप रहता है। बुद्धि जब तक इधर-उधर ढूँढ़ती है, तब तक नहीं पाती और जब वही बुद्धि निर्मलता के आसन पर आसीन होकर मनसहित इन्द्रियों को समेटकर हृदय-देश में निरोध कर लेती है, उस निरोध के भी विलिनीकरण की अवस्था में अपने ही हृदय में परमात्मा को पा लेती है। यहाँ भी योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार संसार वृक्ष है, जिसका मूल सर्वत्र है और शाखाएँ सर्वत्र हैं। 'कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके'- कर्मों के अनुसार केवल मनुष्य-योनि में बन्धन तैयार करता है, बाँधता है। अन्य योनियाँ तो इन्हीं कर्मों के अनुसार भोग भोगती हैं। अतः दृढ़ वैराग्यरूपी शस्त्र द्वारा इस संसाररूपी पीपल के वृक्ष को तू काट और उस परमपद को ढूँढ़, जिसमें गये हुए महर्षि पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते। कैसे जाना जाय कि संसार-वृक्ष कट गया? योगेश्वर कहते हैं कि जो मान और मोह से सर्वथा रहित है, जिसने संगदोष जीत लिया है, जिसकी कामनाएँ निवृत्त हो गई हैं और जो द्वन्द्व से मुक्त है, वह पुरुष उस परमतत्त्व को