यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextपञ्चदश अध्याय ३०५ प्राप्त होता है। उस परमपद को न सूर्य, न चन्द्रमा और न अग्नि ही प्रकाशित कर पाते हैं, वह स्वयं प्रकाशरूप है। जिसमें गये हुए पीछे लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है, जिसे पाने का अधिकार सबको है, क्योंकि यह जीवात्मा मेरा ही शुद्ध अंश है। शरीर का त्याग करते समय जीवात्मा मन और पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के कार्यकलापों को लेकर नये शरीर को धारण करता है। संस्कार सात्त्विक हैं तो सात्त्विक स्तर पर पहुँच जाता है, राजसी हैं तो मध्यम स्थान पर और तामसी रहने पर जघन्य योनियों तक पहुँच जाता है तथा इन्द्रियों के अधिष्ठाता मन के माध्यम से विषयों को देखता और भोगता है। यह दिखायी नहीं पड़ता, इसे देखने की दृष्टि ज्ञान है। कुछ याद कर लेने का नाम ज्ञान नहीं है। योगीजन हृदय में चित्त को समेटकर प्रयत्न करते हुए ही उसे देख पाते हैं, अतः ज्ञान साधनगम्य है। हाँ, अध्ययन से उसके प्रति रुझान उत्पन्न होती है। संशययुक्त, अकृतात्मा लोग प्रयत्न करते हुए भी उसे नहीं देख पाते। यहाँ प्राप्तिवाले स्थान का चित्रण है। अतः उस अवस्था की विभूतियों का प्रवाह स्वाभाविक है। उन पर प्रकाश डालते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि सूर्य और चन्द्रमा में मैं ही प्रकाश हूँ, अग्नि में मैं ही तेज हूँ, मैं ही प्रचण्ड अग्निरूप से चार विधियों से परिपक्व होनेवाले अन्न को पचाता हूँ। श्रीकृष्ण के शब्दों में अन्न एकमात्र ब्रह्म है। ‘अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।’ (तैत्तिरीय उपनिषद्, भृगुबल्ली २) जिसे प्राप्त कर यह आत्मा तृप्त हो जाती है। बैखरी से परापर्यन्त अन्न पूर्ण परिपक्व होकर पच जाता है, वह पात्र भी खो जाता है। इस अन्न को मैं ही पचाता हूँ अर्थात् सद्गुरु जब तक रथी न हों, तब तक यह उपलब्धि नहीं होती। इस पर बल देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण पुनः कहते हैं कि सम्पूर्ण प्राणियों के अन्तर्देश में स्थित होकर मैं ही स्मृति दिलाता हूँ। जो स्वरूप विस्मृत था उसकी स्मृति दिलाता हूँ। स्मृति के साथ मिलनेवाला ज्ञान भी मैं ही हूँ। उसमें आनेवाली बाधाओं का निदान भी मुझसे होता है। मैं ही जानने योग्य हूँ और विदित हो जाने के बाद जानकारी का अन्तकर्ता भी मैं ही हूँ। कौन किसे जाने? मैं वेदवित् हूँ। अध्याय के प्रारम्भ में कहा- जो संसार-वृक्ष को मूलसहित