यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context३१० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता आस्ट्रेलिया में; कहीं भी पैदा हुआ हो, बशर्ते है इन दो में से ही। अभी तक देवों का स्वभाव ही विस्तार से कहा गया, अब असुरों के स्वभाव को मुझसे विस्तारपूर्वक सुन। प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः। न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।।७।। हे अर्जुन ! असुर लोग ‘कार्यम् कर्म’ में प्रवृत्त होने और अकर्तव्य कर्म से निवृत्त होना भी नहीं जानते। इसलिये उनमें न शुद्धि रहती है, न आचरण और न सत्य ही रहता है। उन पुरुषों के विचार कैसे होते हैं?- असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्।।८।। वे आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य कहते हैं कि जगत् आश्रयरहित है, सर्वथा झूठा है और बिना ईश्वर के अपने आप स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है, इसलिये केवल भोगों को भोगने के लिये है। इसके सिवाय और क्या है? एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः। प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः।।९।। इस मिथ्या दृष्टिकोण के अवलम्बन से जिनका स्वभाव नष्ट हो चुका है वे मन्दबुद्धि, अपकारी, क्रूरकर्मी मनुष्य केवल जगत् का नाश करने के लिये ही उत्पन्न होते हैं। काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः। मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः।।१०।। वे मनुष्य दम्भ, मान और मद से युक्त हुए किसी भी प्रकार पूर्ण न होनेवाली कामनाओं का आश्रय लेकर, अज्ञान से मिथ्या सिद्धान्तों को ग्रहण करके अशुभ तथा भ्रष्ट व्रतों से युक्त हुए संसार में बरतते हैं। वे व्रत भी करते हैं; किन्तु भ्रष्ट हैं। चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः। कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः।।११।। वे अन्तिम श्वास तक अनन्त चिन्ताओं को लिये रहते हैं और विषयों