यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextषोडश अध्याय ३११ को भोगने में तत्पर वे 'बस इतना ही आनन्द है'- ऐसा मानते हैं। उनकी मान्यता रहती है कि जितना हो सके भोग संग्रह करो, इसके आगे कुछ नहीं है। आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः। ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्।।१२।। आशारूपी सैकड़ों फाँसियों से (एक फाँसी से ही लोग मर जाते हैं, यहाँ सैकड़ों फाँसियों से) बँधे हुए काम-क्रोध के परायण विषय-भोगों की पूर्ति के लिये वे अन्यायपूर्वक धनादि बहुत से पदार्थों को संग्रह करने की चेष्टा करते हैं। अतः धन के लिये वे रात-दिन असामाजिक कदम उठाया करते हैं। आगे कहते हैं- इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्। इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।।१३।। वे सोचते हैं कि मैंने आज यह पाया है, इस मनोरथ को प्राप्त करूँगा। मेरे पास इतना धन है और फिर कभी इतना हो जायेगा। असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि। ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी।।१४।। वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और दूसरे शत्रुओं को भी मैं मारूँगा। मैं ही ईश्वर और ऐश्वर्य को भोगनेवाला हूँ। मैं ही सिद्धियों से युक्त, बलवान् और सुखी हूँ। आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः।।१५।। मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुम्बवाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, मैं दान दूँगा, मुझे हर्ष होगा- इस प्रकार के अज्ञान से वे विशेष मोहित रहते हैं। क्या यज्ञ, दान भी अज्ञान है? इस पर अध्याय १७ में स्पष्ट किया है। इतने पर भी वे नहीं रुकते बल्कि अनेक भ्रान्तियों के शिकार रहते हैं। इस पर कहते हैं- अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः। प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ।।१६।।